राहुल की उलटबांसी

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इन दिनों यूरोप के दौरे पर हैं। वहां जर्मनी के हेमबर्ग स्थित बूसेरियस समर स्कूल में छात्रों को संबोधित करते हुए नरेन्द्र मोदी सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किये। उनका आरोप है कि नोटबंदी और जीएसटी जैसे दो बड़े आर्थिक फैसलों का क्रियान्वयन ठीक से नहीं होने के कारण समाज में हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं। विशेषकर भीड़ की हिंसा इसी का परिणाम है।

यह सच है कि नोटबंदी का फैसला जल्दबाजी में लिया गया और इसके चलते छोटे-मोटे रोजगार-धंधा करने वाले और मजदूर तबकों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। लेकिन धीरे-धीरे स्थितियां सामान्य हो गई। उसी तरह, जीएसटी लागू होने के समय उद्योग जगत को विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था। लेकिन इसकी तिमाही रिपोर्ट बताती है कि इससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने लगी है।

भारतीय समाज में भीड़ की हिंसा कोई नई सामाजिक कुप्रवृत्ति नहीं है। हां, इतना जरूर है कि इसमें इजाफा हुआ है। लेकिन किसी भी तरह की हिंसा और अपराध का मामला सीधे तौर पर कानून और प्रशासन से जुड़ा होता है। अगर समाज में भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसक घटनाएं बढ़ रही हैं तो इसका मतलब यह है कि पुलिस और प्रशासन का इकबाल खत्म हो रहा है।

अत: इसका समाधान भी इसी नजरिये से करना होगा। खबरें ये भी आ रही हैं कि सत्तारूढ़ दल को बदनाम करने के लिए विरोधी दलों के कार्यकर्ता भीड़ की हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं। इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का इसे बेरोजगारी से जोड़ कर देखना उचित नहीं लगता। सच तो यह है कि कांग्रेस के शासन में भी देश की आबादी और रोजगार के बीच संतुलन कभी नहीं रहा है।

हालांकि राहुल का यह कहना सच के करीब है कि विकास की प्रक्रिया से आदिवासी, दलितों और अल्पसंख्यकों को बाहर रखा जाएगा तो ‘विद्रोही और आतंकवादी’ समूह उभर सकते हैं। भारत में नक्सलवाद-माओवाद का उभार भी गरीबी और दरिद्रता की पैदावार हैं और कांग्रेस के शासनकाल में ही इन अतिवादी दलों का उद्भव और विकास हुआ है।

इसलिए राहुल गांधी को किसी भी राजनीतिक-सामाजिक और आर्थिक मसलों पर बात करने से पहले उस विषय-वस्तु का सम्यक अध्ययन करना होगा। इनको ध्यान में रखते हुए ही अपने विचार व्यक्त करने होंगे। अगर वे अपने को नरेन्द्र मोदी के सशक्त विकल्प के रूप में पेश करना चाहते हैं, तब तो यह अपेक्षा और बढ़ जाती है।