राज्यों में भी उच्च सदन

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उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू के राज्य सभा की तरह सभी राज्य विधानसभाओं में उच्च सदन यानी विधान परिषद गठित करने के सुझाव को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। हालांकि देश में ऐसे लोग भी हैं, जो विधान परिषद को अनावश्यक मानते हैं किंतु इस संबंध में कोई ठोस तर्क इनके पास नहीं होता। उच्च सदन के पीछे मुख्य सोच यही थी कि इसमें वैसे योग्य लोगों को पार्टियां ला सकती हैं, जिनकी आवश्यकता नीति-निर्माण में उपयुक्त विचार देने तथा सार्थक बहस के लिए तो है, पर वे चुनाव में जीतकर निचले सदन में नहीं आ सकते। पार्टियां इसकी जगह इसमें कुछ अयोग्य लोगों को भी निर्वाचित करा देती हैं, तो इसका यह अर्थ नहीं कि विधान परिषदों की आवश्यकता को ही खारिज कर दिया जाए।

उच्च सदन विधायिका में संतुलन के लिए अनिवार्य है। नायडू का सुझाव बिल्कुल सही है कि राज्यों में उच्च सदन की जरूरत को देखते हुए इसके गठन के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाने पर विचार करना चाहिए। अभी देश के सिर्फ  सात राज्यों उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र-में ही दो सदनों की व्यवस्था है यानी एक चौथाई राज्यों में ही विधानसभा की जगह विधान परिषद है। यहां विधानसभा जैसे चाहे वैसे विधेयक पारित कर सकतीं हैं। विधान परिषद की विशेषज्ञता का लाभ उसे नहीं मिल पाता।

उम्मीद करनी चाहिए कि उपराष्ट्रपति नायडू के सुझाव पर केंद्र और शेष बचे राज्य इस दिशा में पहल आरंभ करेंगे। विधान परिषद के गठन के लिए संविधान के अनुच्छेद 169 के तहत विधानसभा में दो तिहाई बहुमत से पारित प्रस्ताव संसद के समक्ष भेजना होता है। इस प्रस्ताव को अनुच्छेद 171 के तहत संसद के दोनों सदनों से साधारण बहुमत से पारित किए जाने के बाद इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर संबंधित राज्य में विधान परिषद का गठन किया जा सकता है। तात्पर्य यह कि विधान परिषदों के गठन में कोई बड़ी संवैधानिक समस्या नहीं है।

वैसे, कुछ राज्य इस दिशा में पहल कर चुके हैं। मसलन ,राजस्थान और असम की विधानसभा ऐसे प्रस्ताव पारित करके भेज चुकी हैं। तमिलनाडु और ओडिशा भी इस दिशा में सक्रिय हैं। प. बंगाल सरकार भी 2011 से प्रयासरत है। जिन राज्यों का प्रस्ताव आ चुका है, उसे पारित कर केंद्र वहां विधान परिषद के गठन की प्रक्रिया आरंभ होने दे और जिन राज्यों ने पहल नहीं की है, उन्हें ऐसा करने के लिए उत्प्रेरित करे।