राजस्व पर फोकस

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केंद्रीय मंत्री अरु ण जेटली की इस अपील को खारिज करना संभव नहीं है लोग अपना कर ईमानदारी से अदा करें। देश को चलाने के लिए जो धन चाहिए उसका मुख्य स्रोत कर राजस्व ही है। यह भी सच है कि हमारा देश अभी तक कर अनुपालन वाला समाज नहीं बन पाया है। इस स्थिति को बदले की आवश्यकता है। वित्त मंत्री जबसे किडनी ट्रांसप्लांट कराके अस्पताल से बाहर आए हैं, अपनी बात वो फेसबुक के माध्यम से कह रहे हैं।

इस बार उन्होंने राजकोष से लेकर अर्थव्यवस्था की स्थिति रोजगार सृजन आदि पर प्रकाश डाला है। किंतु उनका मुख्य फोकस कर राजस्व ही है। उनके पूरे पोस्ट का भाव यही है कि यदि देश को कर राजस्व के लिए पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करनी है तो फिर अन्य क्षेत्र में करों की वृद्धि करनी होगी। यहां तक तो बात समझ में आती है। किंतु कई बार बातें सच होते हुए भी राजनीति में उसके कहने का तरीका अलग होता है।

आप ऐसी भाषा न बोलें, जिससे राजनीतिक नुकसान होने की संभावना बढ़ जाए। पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने पेट्रोल, डीजल पर से 25 रु पया तक कर कम करने का जो वक्तव्य दिया वह एक राजनीतिक वक्तव्य था। देश के आम व्यक्ति को भी अंदाजा है कि यह संभव नहीं।

जेटली का यह कहना भी सही है कि उनके पूर्ववर्ती ने स्वयं अपने शासनकाल में ऐसा नहीं किया। पर इसी के साथ सीधे रु खी भाषा में यह कह देना कि उत्पाद शुल्क में कटौती नहीं की जाएगी, राजनीतिक रूप से जोखिम भरा है। हम यह भी मानते हैं कि देश जिस स्थिति में है यदि तेल पर से उत्पाद शुल्क में भारी कटौती की जाएगी तो फिर सरकार को कर्ज लेना पड़ेगा एवं धीरे-धीरे हम कर्ज के जाल में फंस जाएंगे।

तेल से करों में कटौती का असर उत्पादकता पर भी पड़ेगा। किंतु इस समय जब तेल के मूल्य कम करने की मांग हो रही है, सरकार की ओर से बयान आ रहे हैं कि वह ऐसे उपायों पर विचार कर रही है, जिससे इसका दीर्घकालीन समाधान निकले, वित्त मंत्री के सीधे कर कटौती से इनकार करने की जनता के बीच नकारात्मक प्रतिक्रिया होगी। बिना इसके भी अपनी बात कही जा सकती थी।

जेटली भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं। उन्हें पता होगा कि इस वर्ष के विधानसभा चुनाव वाले तीन राज्यों में उनकी सरकार है और उसके बाद 2019 में आम चुनाव होना है। विपक्षी उनके इस पोस्ट को उद्धृत करके जनता को भाजपा के खिलाफ करने की कोशिश करेंगे।