रमजान में संघर्ष विराम

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रमजान के पवित्र माह में घाटी में सैन्य अभियान को विराम देने की केंद्र सरकार की पहल वाकई प्रशसंनीय कही जाएगी। राज्य में अमन बहाली के वास्ते कुछ महीने के लिए संघर्ष विराम को अमल में लाया जाना बेहद समझदारी भरा निर्णय है। हालांकि हमले की स्थिति में जवाब देने का अधिकार सुरक्षा बलों के पास रहेगा।

पिछले सप्ताह राज्य में गठबंधन सरकार की मुखिया महबूबा मुफ्ती ने सैन्य अभियान को मुल्तवी रखने की अपील केंद्र से की थी। हालांकि तब सरकार की पार्टनर भाजपा ने इसे खारिज कर दिया था। दरअसल, सूबे में आतंकी भी बेतहाशा बढ़े हैं और सुरक्षा बलों का ‘ऑपरेशन ऑलआउट’ भी उसी तेजी से परवान चढ़ा है। इस साल अब तक 55 से ज्यादा आतंकवादी और 27 नागरिकों की मौत हो चुकी है। पिछले कुछ माह में आतंकी हिंसा की 80 फीसद से ज्यादा वारदात देखी गई हैं, जिनमें ज्यादातर मुठभेड़ स्थलों पर आतंकवादियों के बचाव के लिए नागरिकों को ढाल बनते देखा गया है।

सरकार, सेना और पुलिस बल इसी अंदेशे की वजह से अपने अभियान को न तो बंद करने के मूड में दिखती है न कम करने के। सेना का संदेह स्वाभाविक भी मालूम पड़ता है। 18 साल पहले अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने नवम्बर 1999 से अप्रैल 2000 (पांच महीने) सैन्य अभियान पर बंदिश लगाने का चौंकाने वाला फैसला लिया था। उस दौरान घाटी में सक्रिय ज्यादातर आतंकी गुटों ने इस फैसले को सिरे से खारिज कर दिया था।

इस बार भी संघर्ष विराम के फैसले के ऐलान के महज कुछ घंटों बाद ही 4 जगहों पर आतंकी हमले हुए, जो कि चिंता का सबब है। केंद्र और सुरक्षा बलों के इस साहसिक पहल की वैसे तो राज्य के बाकी राजनीतिक दलों ने की है, मगर कुछ बेहतर होने का अहसास तभी किया जा सकता है, जब रमजान के महीने में शांति का पैगाम फिजा में फैले। नि:संदेह आतंकवादी घटनाओं ने राज्य को विकास के पैमाने में काफी दरिद्र बना दिया है और इसकी भरपाई तभी हो सकती है जब युवाओं को रोजगार और अच्छा माहौल मिले, महिलाओं और बुजुगरे को बरसों पुराने कश्मीर सा वातावरण मिले और घाटी एक बार फिर बाकी देश का सिरमौर बने।

पाकिस्तान परस्त मंसूबों को सिर्फ वहां के नागरिक ही जमींदोज कर सकते हैं। सेना के अभियानों पर रोक तो महज दिलासा देने वाली बात है। हां, इस संघर्ष विराम को कोई हमारी कमजोरी नहीं समझे। इस फैसले का सम्मान हर किसी को करना चाहिए।