रजिस्टर पर रार

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यह पहले दिन से साफ था कि असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का अंतिम मसौदा जिस दिन जारी होगा देश की राजनीति में तूफान खड़ा हो जाएगा। आखिर, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर असम में वास्तविक नागरिकों की पहचान के बाद काफी संख्या में ऐसे लोगों को बाहर होना ही था, जिनकी नागरिकता संदिग्ध हो।

असम में बांग्लादेश से आने वाले विदेशी घुसपैठियों के विरुद्ध जनता का आंदोलन भूला नहीं जा सकता। आज भी यह मुद्दा जीवित है। विदेशी घुसपैठियों के कारण पूर्वोत्तर के कई इलाकों का जनसंख्या संतुलन ही नहीं बिगड़ा, बल्कि  सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक जटिलताएं भी पैदा हो गई। असम में उग्रवाद का बड़ा कारण यही है। आठ जिले ऐसे हैं, जहां  स्थानीय निवासियों को इसका घातक परिणाम भुगतना पड़ा है। अलग-अलग जनजातियों में इसके विरुद्ध कुछ समूहों ने हथियार उठाए हुए हैं। असम गण परिषद की सरकार इसी मुद्दे पर बनी थी, लेकिन उस समय यह काम नहीं हो सका।

फलत: सरकार चली गई। भाजपा ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया। जो नेता या राजनीतिक दल इस पर हंगामा कर रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि विदेशियों की छंटाई देशहित में है। यदि महापंजीयक कार्यालय कह रहा है कि 2.89 करोड़ नामों की नागरिकता मान्य है, और करीब 40 लाख का नहीं तो उसके पीछे तर्क होगा। भारत के महापंजीयक कह रहे हैं कि यह एनआरसी के अंतिम मसौदे के प्रकाशन के रूप में एक मील का पत्थर साबित होगा और एक ऐतिहासिक क्षण है तो उन पर संदेह करने का कारण नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी साफ कर दिया है कि यह केवल अंतिम मसौदा है।

सभी दावों और आपत्तियों के निपटारे के बाद समग्र एनआरसी का प्रकाशन किया जाएगा यानी जिन लोगों के नाम छूट गये हैं, वे दावों के साथ आ सकते हैं। उनकी जांच होगी। गलती है तो सुधार होगा। वैसे आज की स्थिति में पूरी तरह विदेशी नागरिकों की पहचान कठिन ही है। उनकी कई पीढ़ियां हो गई हैं। ऐसा न हो कि कोई कागजात न होने वाले भारतीय भी विदेशी की श्रेणी में आ जाएं।

हो सकता है कि मूल निवासी होते हुए भी किसी आम गरीब के पास कोई संबंधित कागजात न हो। दूसरे, जो पड़ोसी देशों से अपने धर्म के कारण उत्पीड़ित होकर भगाए गए हैं, उनके प्रति सरकार को सहानुभूति से विचार करना चाहिए। कुल मिलाकर इस पर राजनीति न हो और इस आवश्यक कार्य को पूरा होने दिया जाए।