योग के साथ-साथ..

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योग और स्वच्छता जीवन-यापन की कला और विज्ञान है। यह इंसान को रोग से निरोग की ओर ले जाता है। दोनों का सीधा संबंध इंसान की सेहत और तंदुरुस्ती से है; इसीलिए इनको जनांदोलन बनाना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सपना रहा है। चौथे अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर भारत समेत सौ से ऊपर देशों के लोगों ने योगाभ्यास किया।

इससे जाहिर होता है कि प्रधानमंत्री की पहल से यह पूरे विश्व में लोकप्रिय हो रहा है। चूंकि योग का असर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर जल्द असर डालता है, इसलिए यह कम समय में ज्यादा लोकप्रिय होता जा रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। स्वच्छता का भी इंसान के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से गहरा रिश्ता है, लेकिन भारत के लोग स्वच्छता अभियान को अपने घरों के अंदर तक ही सीमित रखना चाहते हैं। शायद इसलिए प्रधानमंत्री मोदी का स्वच्छता अभियान परवान नहीं चढ़ सका। भाजपा के ज्यादातर मंत्रियों और नेताओं ने प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए कुछ दिनों तक सड़कों पर झाडू लगाने का नाटक किया और धीरे-धीरे इस अभियान का भी अंत हो गया जैसा सरकार के अन्य जनकल्याणकारी अभियान या योजनाओं का होता है। स्वच्छता जैसे महत्त्वपूर्ण और आवश्यक अभियान का दम तोड़ना हमारे देश-प्रेम की कलई खोलता है।

हमारा देश-प्रेम, देश-भक्ति और राष्ट्रवाद सिर्फ क्रिकेट के मैदान में दिखाई देता है। वास्तव में हम राष्ट्रवाद का मुखौटा लगाकर खुद को छलते हैं। वरना योग की तरह स्वच्छता अभियान भी अब तक आंदोलन का रूप ले चुका होता। यह सच है कि योग भारत की समृद्ध विरासत का हिस्सा है, और वैज्ञानिक आधार पर भी यह स्थापित हो गया है कि योग हृदय रोग, मधुमेह, श्वांस रोग जैसी बीमारियों से लड़ने में कारगर है।

लेकिन योग को घर-घर तक पहुंचाने के अभियान के साथ-साथ सरकार को विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के मुताबिक, डॉक्टरों और मरीजों के अनुपात के असंतुलन को संतुलित करने का प्रयास करना चाहिए। सेंट्रल ब्यूरो ऑफ हेल्थ इंटेलिजेंस की ओर से जारी की गई नेशनल हेल्थ प्रोफाइल-2018 के आंकड़े स्वास्थ्य क्षेत्र की दुर्दशा की कहानी बयां कर रहे हैं। इनके मुताबिक, मरीजों की संख्या की तुलना में डॉक्टर न के बराबर हैं, और स्वास्थ्य पर खर्च करने के मामले में भारत अपने पड़ोसी देशों से भी काफी पीछे है। क्या सरकार इस ओर भी ध्यान देगी?