येदियुरप्पा का विश्वास

,

भाजपा के  बीएस येदियुरप्पा ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है। उन्हें 15 दिनों के भीतर विधानसभा में बहुमत हासिल करना है। भाजपा के पास मात्र 104 विधायक हैं और बहुमत की एक सामान्य सरकार के लिए कम से कम 112 विधायक चाहिए। जाहिर है कि येदियुरप्पा एक अल्पमत सरकार के मुख्यमंत्री हैं। इसके बावजूद वह 15 के बहुत पहले ही विश्वास हासिल करने का दावा कर रहे हैं। कैसे? वह भी तब जब कांग्रेस और जनता दल एस व उनके समर्थक विधायकों की कुल संख्या 117 है। और वे भाजपा को राजभवन से पहले न्योता मिलने के औचित्य और आधार को लेकर कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर लड़ने के लिए तैयार हैं।

विपक्षी विधायक आश्वस्त हैं कि अगर वे नहीं टूटे तो येदियुरप्पा विश्वास मत हासिल नहीं कर पाएंगे, फिर कांग्रेस-जदएस की सरकार आनी ही आनी है। यह स्थिति है। ऐसे में येदियुरप्पा के विश्वास का आधार क्या है? खुद उनको और उनकी पार्टी के प्रबंधकों तथा लोगों को भी मालूम है कि रास्ता क्या है? या तो विपक्ष में दरार पैदा किये जाएं, विधायकों को पद-पैसे का लालच दिया जाए और बहुमत परीक्षण के दौरान मुंहमांगी कीमत पर उनकी गैरहाजिरी खरीद ली जाए। भारतीय राजनीतिक का कुछ दशकों से यह सर्वस्वीकृत पंथ बन चुका है। सत्ता और विपक्ष इस मार्ग पर समान भाव से चलते आए हैं।

विपक्ष में सिद्धांत के आधार पर वैध दो फाड़ के आसार कमजोर हैं। अब अगर विधायक इस्तीफा देते हैं, टूटते हैं या विश्वास मत के दिन अनुपस्थित हो जाते हैं तो वह दल-बदल निरोधक कानून के आधार पर अयोग्य होकर अपनी सदस्यता गंवा बैठेंगे। शुरुआत में ही इतना बड़ा रिस्क लेने के लिए कोई विधायक शायद तैयार हों। यह भी कोई क्यों करना चाहेगा, जब उनका गठबंधन सरकार में जाने की योग्यता रख रहा है? इसलिए येदियुरप्पा को बधाई देते हुए केंद्र में 1996 की वाजपेयी सरकार के साम्य समीकरण का स्मरण हो रहा है।

जब एकजुट विपक्ष के एक भी सांसद को प्रभावित न कर सकने की स्थिति में अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी 13 दिन की सरकार को बहुमत परीक्षण के पहले ही इस्तीफा दे देना पड़ा था। हालांकि तब से भाजपा की ताकत में बहुत इजाफा हुआ है पर सभी दलों की राजनीतिक नैतिकता घटी है। एक बात और; जिस दावे से राज्यपाल ने येदियुरप्पा को न्योता है, वर्तमान में वह सुविधानुसार और पक्षपाती लगा है। इस पर उठते सवाल बदलाव लाएंगे।