यात्रा का निहितार्थ

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तीन देशों की विदेश यात्रा का पहला पड़ाव स्वीडन था। यहां प्रधानमंत्री मोदी का अपने समकक्ष स्टीफन लोफवेन के साथ शिखर वार्ता हुई, जिसमें दोनों नेताओं ने रक्षा, साइबर सुरक्षा और क्षेत्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने का फैसला किया। स्वीडन इस लिहाज से उत्तरी यूरोप का महत्वपूर्ण देश माना जाता है कि वह मानव विकास के ज्यादातर मानकों पर अव्वल रहता है।

मोदी ने स्वीडन के इस वैशिष्टय को ठीक से समझा और परखा है। इसलिए उन्होंने अपने समकक्षी स्टीफन लोफवेन के साथ द्विपक्षीय वार्ता में इस मुद्दे पर अधिक जोर दिया कि भारत की विकास यात्रा में स्वीडन किस प्रकार मदद कर सकता है। दोनों नेताओं की शिखर वार्ता में नवोन्मेष प्रमुख रहा।

लिहाजा आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच नवोन्मेषी साझेदारी की शुरुआत होने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। स्वीडन के प्रधानमंत्री स्टीफन लोफवेन ने भारत को वैश्विक ताकत बताया और कहा कि दोनों देशों की जोड़ी बहुत उत्तम है। उनकी स्वीकारोक्ति से उत्तरी यूरोप के अन्य देशों में भारत की चमक बढ़ेगी, ऐसा विश्वास है। प्रधानमंत्री मोदी की स्वीडन की इस यात्रा का एक अहम पक्ष यह भी रहा कि नाव्रे, फिनलैंड, डेनमार्क और आइसलैंड के प्रधानमंत्रियों के साथ भी उनकी शिखर वार्ता हुई। ये सभी स्कैंडिनेवियन देश हैं।

यह पहला अवसर था जब भारत के किसी प्रधानमंत्री का इन देशों के प्रधानमंत्रियों के साथ शिखर सम्मेलन हुआ। ये सभी देश न केवल प्रति व्यक्ति आय और मानव विकास के मानकों पर अव्वल रहते हैं, बल्कि महिला अधिकार, पुरुष-स्त्री समानता और बाल संरक्षण के मामले में भी दुनिया का कोई भी देश इनका मुकाबला नहीं कर सकता। सबसे अहम बात यह है कि इन देशों ने पारंपरिक मूल्यों को साझेदार और सहयोगी बनाकर अपनी विकास यात्रा को आगे बढ़ाया है। भारत इनसे बहुत कुछ सीख सकता है।

पूंजीवादी व्यवस्था और मुक्त व्यापार के साथ-साथ इन्होंने समाजवादी समाज की संरचना कैसे की है, यह बात भारत के कम्युनिस्टों को उनसे सीखनी चाहिए। बेहतर तो यह होगा कि प्रधानमंत्री मोदी अपने मंत्रियों और सांसदों को प्रशिक्षण के लिए वहां भेजें। इस लिहाज से प्रधानमंत्री मोदी की स्वीडन यात्रा काफी फायदेमंद हो सकती है।