यह आग बुझाइए

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गुजरात से भागते उत्तर भारतीयों को देखकर कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि वहां क्या हुआ होगा। सामान्य स्थिति में कोई अपनी रोजी-रोटी छोड़कर वापस नहीं आता। गुजरात पुलिस का कहना कि बहुत सारे लोग त्योहार मनाने जा रहे हैं, सफेद झूठ है। इस समय ऐसा कोई त्योहार नहीं जिसके कारण वहां से भरी हुई रेलें उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश की ओर आएं।

यह साफ है कि ठाकोर सेना के लोगों ने एक नाबालिग के साथ हुए बलात्कार का बहाना बनाकर धमकी भरा ऐसा वातावरण बनाया कि उत्तर भारतीय जान बचाकर भागने लगे। इस जघन्य अपराध के आरोप में एक बिहारी के पकड़े जाने के बाद ऐसा आक्रोश पैदा किया मानो उत्तर प्रदेश, बिहार या मध्य प्रदेश के सारे लोग अपराधी ही हों।

हालांकि गुजरात सरकार ने अब सख्ती बरती है। सारे पुलिस वालों की छुट्टियां रद्द कर उनकी उन जगहों पर तैनाती की गई है, जहां कारखानों या बाजारों में उत्तर भारतीय कार्यरत हैं या उनका खुद का व्यापार है या फिर उनका निवास है। किंतु स्थिति अभी तक बहुत बदली नहीं है। गुजरात सदियों से प्रवासियों का स्वागत करने वाला प्रदेश रहा है।

गुजराती समुदाय खुद प्रवासी बनकर जहां भी गए वहां दूसरी संस्कृतियों के साथ घुल-मिलकर रहते हैं। इसलिए गुजरात में ऐसी संकीर्ण और घातक क्षेत्रीयता को उभारा जा सकता है, इसकी कल्पना नहीं थी। जाहिर है, इसकी साजिश लंबे समय से रची जा रही थी। कांग्रेस के विधायक एवं ठाकोर सेना के संयोजक अल्पेश ठाकोर प्रवासियों के खिलाफ लोगों को भड़का रहे हैं।

घृणा पैदा कर आग लगाने में उनकी तथा उनके संगठन की भूमिका प्रमुख रही है। लौटते कामगार ही बता रहे हैं कि ठाकोर सेना के लोगों ने ही उन्हें धमकाया। कहा जा रहा है कि ज्यादातर उत्तर भारतीय एक पार्टी को वोट देते हैं, इसलिए ऐसी साजिश रची गई। यह अत्यंत शर्मनाक है। ये लोग भूल रहे हैं कि गुजरात की अर्थव्यवस्था में गैर गुजरातियों का बहुत बड़ा योगदान है।

वहां करीब एक तिहाई से ज्यादा कामगार गैर गुजराती ही हैं। उच्च पदों से मजदूर तक ये भरे-पड़े हैं। इनने वहां स्वयं का कारोबार भी खड़ा किया है। अगर ये बाहर हो गए तो गुजरात की अर्थव्यवस्था की चूल हिल जाएगी। तभी तो उद्योग एवं व्यापार संगठनों ने मुख्यमंत्री विजय रु पाणी से मिलकर इसे रोकने तथा गैर गुजरातियों की सुरक्षा की मांग की है। यह भयावह स्थिति जितनी जल्दी रु के उतना ही अच्छा। देश सबका है।