मौद्रिक नीति से मायूसी

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भारतीय रिजर्व बैंक ने शुक्रवार को देश के उद्योग जगत, खासकर शेयर बाजार को खासा मायूस किया। उम्मीद थी कि रु पये की कमजोर स्थिति से तेज हुई महंगाई दर,चालू खाता घाटे पर बढ़ रहे बोझ और आसमान छूती कच्चे तेल की कीमतों को देखते हुए रिजर्व बैंक कम से कम प्रमुख दरों में 25 आधार अंकों की बढोतरी जरूर करेगा, लेकिन रिजर्व बैंक ने इसे यथावत रखा।

नतीजा हुआ कि एक दिन पहले आठ सौ अंकों की गिरावट झेल चुका शेयर बाजार एक बार फिर 792 अंक और लुढ़क गया। उधर, रु पया अब तक की सबसे बड़ी गिरावट के साथ डॉलर के मुकाबले 74 पर आ गया। कुल मिला कर अक्टूबर में अभी तक 1850 अंकों या 5.1 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है और निवेशकों को 8 लाख करोड़ रु पये से अधिक का नुकसान हो चुका है।

सवाल उठता है कि आखिर इतने नाजुक वक्त पर रिजर्व बैंक ने प्रमुख दरों में बढोतरी से परहेज क्यों किया? आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल का तर्क है कि वैश्विक वित्तीय बाजार में तेज उतार-चढ़ाव की वजह से महंगाई की संभावना बदस्तूर है। कच्चे तेल की तेज कीमत और उसमें उतार-चढ़ाव और वैश्विक वित्तीय स्थिति की लगातार बनी हुई सख्ती अभी भी विकास एवं महंगाई के लिए खतरे के संकेत हैं। इसलिए घरेलू वृहद आर्थिक बुनियादी कारकों को मजबूत बनाना ज्यादा जरूरी है।

उनके अनुसार रिजर्व बैंक की प्राथमिकता महंगाई पर अंकुश लगाने, राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखने, तरलता और पूंजीगत प्रवाह को बनाये रखने की है। त्रासदी यह है कि भले ही रिजर्व बैंक ने रेपो दर को यथावत बनाये रखा, लेकिन आवास ऋण से लेकर कार और पर्सनल लोन में बढ़ोतरी होनी तय है क्योंकि भारतीय स्टेट बैंक और एचडीएफसी तक ज्यादातर बैंकों एवं आवास वित कंपनियों ने पहले ही अपनी जमा दरों में बढ़ोतरी कर दी है और नीतिगत दरों में वृद्धि की संभावना से अपनी उधारी दरों को बढ़ा रही हैं।

बहरहाल, रिजर्व बैंक ने एक चीज तय कर दी है कि इस बार भले ही उसने नीतिगत दरों में बढ़ोतरी न की हो, लेकिन इन प्रमुख दरों में आगे इजाफा होने के दरवाजे खुले हुए हैं। पूरी गुंजाइश है कि रिजर्व बैंक इसी कैलेंडर वर्ष में इन दरों में बढ़ोतरी कर दे। लिहाजा, 5 दिस. को होने वाली मौद्रिक नीति समिति की अगली बैठक का अभी से ही बेसब्री से इंतजार हो रहा है।