मौत का फ्लाईओवर

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जिस दिन देश कर्नाटक चुनाव परिणाम पर टकटकी लगाए हुए था, ठीक उसी दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भीषण हादसा हुआ। बेहद व्यस्त समय में शाम को निर्माणाधीन फ्लाईओवर पर रखा 50 मीटर लंबा और 100 टन वजनी बीम (स्लैब) गाड़ियों और यात्रियों के ऊपर गिर पड़ा। घटना में अभी तक 19 लोगों की जान जाने की खबर आई है जबकि कइयों के दबे होने की खबर है। फ्लाईओवर 2015 से बन रहा था और इसके पूरा होने की मियाद मार्च 2019 थी, जिसे बढ़ाकर अक्टूबर 2019 कर दिया गया था।

वैसे तो देश के कई हिस्सों में पुल और फ्लाईओवर का निर्माण कार्य सालों भर चालू रहता है, मगर 99 फीसद इलाकों में सुरक्षा मानकों का रत्ती भर भी ख्याल नहीं रखा जाता है। इंडियन रोड कांग्रेस की नियमावली कहती है कि किसी भारी और बड़े फ्लाईओवर की ढलाई के बाद या निर्माण कार्य के वक्त उसके नीचे 4 हफ्ते तक कोई वाहन नहीं चलने चाहिए। मगर वाराणसी के संदर्भ में न तो इस नियमावली का पालन किया गया और न ही ट्रैफिक के सर्वमान्य सिद्धांतों का। बस वसूली के चक्कर में नियमों को धता बताकर लोगों की जान से खेला गया।

तमाम शिकायतों के बावजूद स्थानीय प्रशासन ‘अंधेर नगरी और चौपट राजा’ की तर्ज पर काम करती रही। जबकि इस घोर लापरवाही के जिम्मेदार राज्य सेतु निगम लिमिटेड, स्थानीय प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस पर गैर इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए और फास्ट ट्रैक कोर्ट में मामला चलना चाहिए।

जांच, निलंबन, कारण बताओ नोटिस और आर्थिक मदद की आड़ में जनता की आंखों में धूल झोंकने का प्रपंच बंद किया जाना चाहिए। जांच का विषय सीधा और सपाट हो। अगर निर्माण सामग्री घटिया इस्तेमाल में लाई गई, जैसा की खबर है तो उन अधिकारियों और ठेकेदारों को तुरंत निपटाया जाना चाहिए।

मुनाफे की हवस में ठेकेदार या निर्माण कंपनी तय मापदंडों और नियमों को ताक पर रखकर काम तो शुरू कर देती है, जिसका कुल जमा परिणाम देश भर में गिर रहे फ्लाईओवरों और पुलों के रूप में सामने आता है। सवाल यही कि आखिर सरकार मौत की चीख क्यों नहीं सुन पाती है? क्यों अधकचरी जांच और मगरमच्छी आंसू बहाकर जनता की भावनाओं से खेलती है? इसका जवाब कब मिलेगा?