मुद्दा : सार्थक संवाद से ही रुकेगी खुदकुशी

मोनिका शर्मा,

दुनियाभर में आत्महत्या के बढ़ते आंकड़े चिंता का विषय हैं। सुसाइड की बढ़ती प्रवृत्ति के प्रति जागरूकता, सतर्कता और समझ को बढ़ावा देने के लिए  विश्व स्वास्थ्य संगठन आज के दिन ‘र्वल्ड सुसाइड प्रिवेंशन डे’ मनाता है। इसका उद्देश्य इस तथ्य के बारे में जागरूकता लाना है, कि आत्महत्या को रोका जा सकता है। यह जागरूकता जरूरी भी है क्योंकि दुनिया में हर साल आत्महत्या से होने मौतें नरसंहार और युद्ध में होने वाली मौतों से भी ज्यादा है। हमारे यहां तो हालिया दिनों में सामूहिक आत्महत्या के मामले भी सामने आये हैं।
भरे-पूरे परिवारों में बड़े-बुजुर्गों ने बच्चों के साथ आत्महत्या का रास्ता चुना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक समूची दुनिया में हर 40 सेकेंड में एक व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है। साल 2018 के शुरुआत में गृह मंत्रालय की ओर से जारी रिपोर्ट के मुताबिक देश में आत्महत्या करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। खासकर युवाओं में सुसाइड का रु झान तेजी से बढ़ा है। यह वाकई चिंतनीय है कि  वैश्विक स्तर पर भी आत्महत्या करने वालों में ज्यादातर 15 से 29 वर्ष की आयु वर्ग युवा ही हैं। भारत में किसान, युवा, महिलाएं और यहां तक कि कम उम्र के बच्चे भी जिंदगी से मुंह मोड़ रहे हैं। हालिया कुछ बरसों में तो जिंदगी से हारने की प्रवृत्ति एक बड़ी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती बन गई है। ऐसे में हमारे समाज और परिवार के बदलते वातावरण को लेकर भी सोचा जाना जरूरी है। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विशेषज्ञों का भी मानना है कि आत्महत्या की वजह ज्यादातर सामाजिक एवं व्यक्तिगत परिवेश से जुड़ी होती है। यही वजह है कि जीवन बचाने की इस लड़ाई में हमारे सामाजिक-पारिवारिक परिवेश भूमिका सबसे अहम है।
मौजूदा दौर में जिंदगी की आपाधापी, अकेलापन और अवसाद जीना मुश्किल ही नहीं कर रहे जिंदगी भी छीन रहे हैं। ऐसे में यह समाज और परिवार की साझी जिम्मेदारी है कि कोई इस माहौल में चुपचाप टूटकर ना बिखर जाए। किसी के मन का कुछ अनकहा-अनसुलझा भाव उसे जीवन की जटिलताओं में यूं ना उलझा दे कि वह जिंदगी से ही मुंह मोड़ ले। सोचिये जहां जिंदगी का ही हाथ छोड़ देने के हालात बन रहे हों, वहां समय रहते संभलना और संभालना कितना जरूरी है? यह भी विचारणीय है कि आखिर क्यों यह राह सबको इतनी आसान लगने लगी है? भीड़ में भी लोग अकेला क्यों महसूस कर रहे हैं? ऐसे प्रश्नों के उत्तर तलाशने और जिंदगियां सहेजने के लिए पूरे सामाजिक पारिवारिक परिवेश को सहयोगी बनाना जरूरी है। यही वजह है कि बीते साल ‘र्वल्ड  सुसाइड प्रिवेंशन डे’ का विषय ही ‘एक मिनट लें, जीवन बदलें’ रखा गया था। इस थीम में यही संदेश दिया गया था कि पल भर को ठहरें, परिवार, दोस्तों, सहकर्मिंयों और आपके साथ क्या हो रहा है? उन बातों के बारे में सोचने का समय निकालें।  अगर आपको लगता है कि कुछ बदल गया है तो अपने आपको, खुद  अपनी  और दूसरों की मदद के लिए तैयार करें। थोड़ी सी संवेदनशीलता मुश्किल समय में अपने आसपास की चीजों को बदलने में मददगार साबित हो सकती है। ऐसी सहायता वह माहौल बना सकती है कि कोई इंसान ऐसी विकल्पहीन स्थिति में ही ना आए कि जिंदगी का चुनाव न कर सके। दरअसल, गैजेट्स और आभासी रिश्तों के इस दौर में संवादहीनता बढ़ी है। सामाजिकता का दायरा तो मानो खत्म ही होता जा रहा है। परिवार और समाज के बिखरते ताने-बाने में इंसान अलग-थलग पड़ रहा है। ऐसे में थोड़ा सहयोग और ठहराव बड़ी मदद कर सकता है।  वैज्ञानिक शोध भी दर्शाते हैं कि लगभग 90 प्रतिशत आत्महंता मृत्यु के समय मानिसक तौर पर त्रस्त होते हैं। नतीजतन, तनाव और अवसाद से घिरे इंसान के मस्तिष्क को निराशा और नकारात्मकता भी अपनी चपेट में ले लेती है।
हमारे यहां ऐसे अधिकतर मामलों में नाकामयाबी, आर्थिक नुकसान, असाध्य बीमारी, अपराध और सामाजिक तिरस्कार जैसे कारण हताशा की वजह बनते हैं। भारत में ऐसे लोगों का भी बड़ा आंकड़ा है, जो शारीरिक-मानसिक व्याधियों से जूझते हुए जिंदगी से मुंह  मोड़ लेते हैं। बीते 15 वर्षो में देश में 3.85 लाख लोग विभिन्न बीमारियों के चलते आत्महत्या कर चुके हैं। हर पांच में से एक आत्महत्या बीमारी के कारण होती है। इसमें कोई शक नहीं कि आत्महत्या के मामलों से जुड़े ऐसे कई सवाल हैं, जो हमारी पारिवारिक-सामाजिक स्थितियों में आ रही विसंगतियों को भी रेखांकित करते हैं। इन हालातों में समाज और परिवार की भूमिका अहम हो जाती है। यह एक साझी जिम्मेदारी है कि हम एक सहयोगी और संवेदनशील परिवेश बनाएं जिसमें कोई जिंदगी से मुंह ना मोड़ें।