मुद्दा : बोला मौन, पर सुना किसने!

मनीषा सिंह,

किसी भी उत्पीड़न के खिलाफ पहला चीत्कार अक्सर मौन की भाषा में फूटता है। यह शुरुआती विरोध होता है जो नादान उम्र के तकाजों और अपने अधिकारों के अज्ञान के कारण इतना मुखर नहीं हो पाता कि मदद के लिए बनी किसी हेल्पलाइन पर अपनी पीड़ा बता सके और अत्याचारों की कोठरी से खुद को बाहर निकालने की आवाज उठा सके। हालांकि पढ़ा जा सकता तो इन घुटी-छिपी आवाजों के पीछे का दर्द समझ में आता और शायद तब उत्पीड़न के शिकार व्यक्ति की मदद का भी कोई जरिया बन पाता।
यह मामला असल में पिछले तीन वर्षो में देश की पुलिस को चाइल्ड हेल्पलाइन पर मिलीं एक करोड़ 36 लाख खामोश फोन कॉल्स का है, जिनके पीछे शायद कोई बच्चा मौजूद था, लेकिन उत्पीड़क के भय के चलते पुलिस को फोन मिलाने के बावजूद अपनी बेबसी बयान नहीं कर पाया। इन फोन कॉल्स का खुलासा हाल में हरलीन वालिया चाइल्ड लाइन इंडिया फाउंडेशन ने किया है। इसके मुताबिक बीते तीन सालों में, अप्रैल, 2015 से मार्च, 2018 के बीच, चाइल्ड हेल्पलाइन नम्बर 1098 पर पूरे देश में 3.4 करोड़ फोन कॉल्स मिलीं। इनसे दिखता है कि इधर के वर्षों में अपने ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ मुंह खोलने का कुछ तो साहस लोगों में आया है। पर इस जानकारी का एक सिरा अभी भी बेहद चिंताजनक है। वह यह कि थानों में इस हेल्पलाइन से जुड़े फोन की घंटी बजने पर जब उन्हें उठाया गया तो उनमें से 1 करोड़ 36 लाख कॉल्स में दूसरी तरफ से बिजली का पंखा चलने या कपड़ों की सरसराहट की आवाजें ही आई। पिछले कुछ अरसे में बिहार और यूपी के बाल संरक्षण गृहों की कलई खुलने के संदर्भ में देखें तो कहा जा सकता है कि ऐसी खामोश टेलीफोन कॉल करने वालों बच्चों के साथ क्या कुछ नहीं हुआ होगा। किसी अत्याचार के हद से गुजरने के बाद ही उन्होंने किसी तरह जानकारी जुटाकर चाइल्ड हेल्पलाइन का नम्बर हासिल किया होगा। कहीं से मोबाइल फोन आदि जुटाकर मदद के लिए फोन किया होगा। लेकिन पीड़क का चेहरा सामने आने पर उन बच्चों का साहस जवाब दे गया होगा और वे ऐन मौके पर खामोश रह गए होंगे।
निस्संदेह ये आशंकाएं फाउंडेशन के शोध और समाज की अपनी समझ पर आधारित हैं, लेकिन हम बच्चों के साथ जैसे घृणित हादसे होते देख रहे हैं, उनके मद्देनजर इन आशंकाओं को खारिज करना आसान नहीं है। अनाथ बच्चों, माता-पिता में संबंध विच्छेद की स्थितियों और जीवन निर्वाह के लिए मां का किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर हो जाना या फिर बाल संरक्षण गृहों में मौजूद बच्चों को कैसी यातनाएं इधर झेलनी पड़ी हैं, उनके असंख्य विवरण हमारे सामने मौजूद हैं। बच्चों में भी लड़कियों पर अत्याचार की घटनाओं ने तो सारी हदें ही पार कर ली हैं। उन्हें किसी अनजान, पड़ोसी या अपराधी के हाथों ही यातना नहीं झेलनी पड़ रहीं, बल्कि नजदीकी रिश्तेदारों तक से यौन उत्पीड़न सहना पड़ रहा है। हो सकता है कि फोन के दूसरे सिरे पर मौजूद बच्चियों ने ऐसे ही किसी शोषण या उत्पीड़न के खिलाफ जाने का साहस किया हो लेकिन या तो थाने से मिले प्रत्युत्तर ने उन्हें फौरन ही खामोश कर दिया होगा या फिर उत्पीड़क की कोई चेतावनी उनके कानों में उस वक्त गूंज गई होगी।
यूं हेल्पलाइन संभालने वाले कर्मचारियों को ट्रेनिंग दी जाती है कि ऐसे फोन आने पर दूसरे छोर पर मौजूद व्यक्ति को धीरज से अपनी बात निस्संकोच कहने का साहस दें पर लगता है कि या तो इस सिस्टम में कोई खामी है, या पुलिस की छवि ऐसी है कि कोई उसके पास जाकर दुखड़ा रोने की बजाय उत्पीड़न सह लेना बेहतर समझता है। खासकर बच्चों और महिलाओं के मामले में पुलिस को लेकर डर निराधार नहीं है क्योंकि रेप तक की शिकायत लेकर थाने गई महिलाओं से पुलिसकर्मिंयों ने ही फिर रेप कर डाला-ऐसे किस्सों की देश में भरमार है। जोखिम उठाकर अपने साथ ज्यादती बताने वाले बच्चों और महिलाओं के लिए ऐसे प्रबंध करने की जरूरत है कि उन्हें अपनी आवाज उठाने में कोई डर-संकोच का सामना न करना पड़े। पिछले साल महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने दफ्तरों में यौन उत्पीड़न की शिकायत के लिए एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म शी-बॉक्स (सेक्सुअल हरासमेंट इलेक्ट्रॉनिक बॉक्स) लॉन्च किया था, कुछ वैसी ही व्यवस्था यातना सह रहे बच्चों के लिए भी बनाने की जरूरत है। ध्यान रखना होगा कि फोन के पीछे बच्चों की खामोश रह गई आवाजों में भी भारी यातना छिपी है बशत्रे उन्हें समय रहते सुन लिया जाए।