मुख्यमंत्रियों का समर्थन

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चार मुख्यमंत्रियों का एक साथ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद के केजरीवाल के समर्थन में आना ऐसी राजनीतिक घटना है, जिसे कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता। हालांकि जिस तरह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, केरल के पी. विजयन, कर्नाटक के कुमारस्वामी एवं आंध्र प्रदेश के चंद्रबाबू नायडू ने दिल्ली के उपराज्यपाल और वहीं भूख हड़ताल पर बैठे केजरीवाल एवं उनके साथियों से मिलने की कोशिश की वह अप्रत्याशित था, लेकिन आश्चर्य जैसा कुछ नहीं। ये सभी मुख्यमंत्री 2019 के चुनाव में विपक्षी एकजुटता के पक्ष में हैं। ममता तो इसके लिए पूरी तरह सक्रिय हैं।

उन्हें केजरीवाल और उनके तीन साथी मंत्रियों का अनशन मोदी विरोधी एकजुटता का अवसर दिखा है। बावजूद इसके चार मुख्यमंत्रियों ने एलजी से मिलने का अनुरोध किया था, जिसे स्वीकार किया जाना चाहिए था। एलजी को मिलने में क्या समस्या हो सकती है? यदि कोई मुख्यमंत्री एवं उसके कुछ साथी मंत्री धरना-अनशन कर रहे हैं तो उनका संज्ञान लिया ही जाना चाहिए। यह बात ठीक है कि केजरीवाल एवं साथियों के अनशन के पीछे कोई नैतिक या मान्य आधार नहीं है। दिल्ली के मुख्य सचिव का आरोप है कि पिछले मार्च में मुख्यमंत्री के आवास पर बुलाई गई बैठक में उनके साथ मारपीट हुई।

बाजाब्ता मुख्य सचिव ने इसके खिलाफ मुकदमा भी किया हुआ है। अगर उनके समर्थन में अधिकारी खड़े हैं और दिल्ली सरकार के साथ पूर्ण सहयोग नहीं कर रहे हैं तो इसमें केंद्र सरकार का क्या दोष है? इस गतिरोध को दूर करने के लिए तो केजरीवाल एवं उनके साथियों को अधिकारियों के साथ संवाद करके बीच का रास्ता निकालना चाहिए।

हां, इस प्रयास में वे केंद्र एवं एलजी का सहयोग चाहते हैं तो उन्हें मिलना चाहिए। अंतत: दिल्ली की जनता का प्रश्न है। केजरीवाल ने एक रणनीति के तहत धरना व अनशन के द्वारा यह धारणा बनाने की रणनीति पर चल रहे हैं कि प्रधानमंत्री के इशारे पर एलजी ने अधिकारियों की हड़ताल करवा रखी है। इसे स्वीकार करने का कोई कारण नहीं है। अधिकारी कह रहे हैं कि वे हड़ताल पर नहीं हैं। तो सच क्या है? बहरहाल, चारों मुख्यमंत्रियों ने नीति आयोग की बैठक में प्रधानमंत्री से इस मामले में बात भी की है। देखना है प्रधानमंत्री क्या करते हैं? किंतु उन्हें भी पता होगा कि मामला केंद्र के कारण नहीं बिगड़ा है। बावजूद इसके गतिरोध खत्म करना आवश्यक है। यह जैसे भी होना चाहिए।