मासूमों पर पथराव

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मासूमों पर भी बरसाये गए पत्थर। हालांकि वे किसी सुरक्षा एजेंसी के नुमाइंदे नहीं थे, न जनप्रतिनिधि, न सरकार और न विरोध जता सकने लायक सक्षम संस्थान। वह एक स्कूल बस थी, जिसमें बच्चे सवार थे। फिर भी उन पर ताबड़तोड़ पत्थर बरसाये गए। ये करने वाले कोई बच्चे नहीं थे। सब के सब होशो-हवास वाले बालिग थे। जाहिर है कि वह कायराना हमला लक्ष्यविहिन नहीं था।

इसका खास मकसद था। सत्ता और समाज को संदेश देना था। यह कि अगर आतंकवादियों को मुठभेड़ों में मार गिराया जाता रहा तो पत्थरबाजी जारी रहेगी। यह सीधे-सीधे आतंकवाद का समर्थन है। कश्मीर की वादियों में आतंक रहे और आतंकवादी सलामत रहें। सुरक्षा एजेंसियां या सेना उनको सलाम करतीं रहें। शूट नहीं करें।

अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे कश्मीर के अशांत रहने का इजहार पूरी दुनिया में करेंगे। यह संदेश उस वक्त दिया जा रहा है, जब जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती इन पत्थरबाजों को ‘गुमराह मासूम’ मानते हुए उन्हें एकमुश्त आम माफी दिये जाने और पुनर्वसित करने की वकालत करती रही हैं। पर वह अपनी बात गठबंधन सरकार के आधे हिस्से और विपक्ष के पूरे विरोध के बावजूद मनवा ले गई।

सरकार यह मान कर चल रही थी कि इससे हिंसक वृत्ति वाले पत्थरबाजों में पछतावा का भाव पैदा होगा, जिससे स्थायी सद्भाव बनेगा। पत्थरबाजी परिदृश्य से एकदम गायब हो जाएगी। पर ऐसा हुआ नहीं। पत्थरबाजों ने सरकार के आकलन को गलत साबित कर दिया। अब जब एक छात्र का माथा पत्थरों को लहुलूहान हो उठा है और वह अस्पताल के बेड पर पीड़ा से बार-बार बिलबिला उठ रहा है, तो मेहबूबा को अपनी नीतियों पर दोबारा सोचना पड़ेगा। नेशनल कान्फ्रेंस नेता उमर फारूक का कहना सही है कि ‘पत्थरबाज सरकारी माफी का बेजा फायदा उठा रहे हैं।’

लिहाजा, मामले दर मामले की समीक्षा करते हुए क्षमादान पर अमल किया जाए। अपराध पर दंड पाने का भय एक हद तक हिंसा का निवारक होगा। इसलिए कि पत्थरबाज रुकने वाले नहीं हैं और न ही कश्मीर में आतंकवाद के थमने के आसार हैं। ऐसे में कानून को अपना काम करने दिया जाना चाहिए।

साथ ही, वहां के समाज को यह नजरिया बना लेना चाहिए कि आतंकवाद किसी का सगा नहीं है। आज नूरुद्दीन का रेहान निशाना बना है तो कल उनके भी नौनिहाल का वह हश्र हो सकता है। अत: समय सभी तरह के आतंकवाद के सभी स्तर पर सक्रिय विरोध का है।