मासिक धर्म : शिक्षित ज्यादा संकोची

धनंजय कु. राय,

निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 का सबसे खूबसूरत पक्ष यह है कि यह सामुदायिक सहभागिता से ऐसे शैक्षिक परिवेश निर्माण की पैरोकारी करता है जो भय, तनाव और चिंता से मुक्त हो। सामान्य तौर पर फेल-पास,कठिन पाठ्यक्रम, भारी बस्ता, गरीबी, बाल श्रम इत्यादि को इस भय और चिंता का आधार माना जाता है और समय-समय पर इसके निदान के लिए उचित कदम भी उठाए जा रहे हैं। सर्वशिक्षा अभियान, मध्याह्न भोजन, निशुल्क ड्रेस, जूते, बैग, किताबें, निशुल्क स्वास्थ्य जांच, खेल-खेल में पढ़ाई, छड़ी मुक्त विद्यालयी परिवेश, बालक केंद्रित रु चिपूर्ण और आनंददायी शिक्षण अधिगम सामग्रियों का निर्माण, स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था और अन्य आधारभूत विद्यालयी संरचनात्मक सुविधाओं को मुहैया कराना इसी दिशा में किए गए प्रयास हैं।
सरकार और शैक्षिक संस्थानों ने इस दिशा में किए  जाने वाले प्रयासों में बालक-बालिका के नैसर्गिक भिन्नता का बखूबी ख्याल भी रखा है; जैसे दोनों के लिए अलग अलग ड्रेस, शौचालय इत्यादि का निर्माण। बालिकाओं के बारे में बात की जाए तो सामान्य भय तो उन्हें प्रभावित करता ही है, साथ ही नैसर्गिक भिन्नता के कारण वो एक विशेष भय से भी ग्रसित रहती हैं, जो उनके शैक्षिक-सामाजिक जीवन को विशेष रूप से प्रभावित करता है। यह भय उनमें एक निश्चित समय पर अनिवार्य रूप से आने वाली प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया मासिक धर्म (पीरियड) से सम्बंधित है। मासिक धर्म स्वच्छता का उचित प्रबंधन न होने के कारण जहां किशोरियों को स्कूल छोड़ना पड़ता है, वहीं इस अवधि में वे स्वयं को एकाकी और हीन भी समझने लगती हैं। परिणामस्वरूप उनके सर्वागीण व्यक्तित्व विकास में बाधा आती है। अशिक्षा, पूर्वाग्रह, रु ढ़िवादी सोच और अंधविश्वास के कारण अभी तक मासिक धर्म पर चर्चा गौण रही है। आज जब हम 76 फीसद अर्थात तीन चौथाई से भी ज्यादा शिक्षित आबादी वाले लोकतांत्रिक देश हैं, तो हमारा संवैधानिक और नैतिक दायित्व बनता है कि हम सांस्कृतिक रुढ़ियों, संकोच, लिंग, धर्म और जाति से ऊपर उठकर स्वस्थ तर्क और वैज्ञानिकता के साथ मासिक धर्म के प्रति संपूर्ण राष्ट्र में स्वस्थ चेतना का वातावरण तैयार करें। यह इसलिए भी कि मासिक धर्म केवल रक्त और अंडे के निष्कासन तक सीमित प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं है बल्कि इसके लिए जरूरी है कि उचित माहवारी उत्पादों के इस्तेमाल के साथ-साथ व्यक्ति की मानसिकता में भी बदलाव हो। ‘सेनिटरी प्रोटेक्शन: एवरी वूमेंस हेल्थ राइट’ के रिपोर्ट के अनुसार केवल 12 फीसद भारतीय महिलाओं तक सेनिटरी नैपकिन की पहुंच है। सर्वेक्षण में ऐसी स्थिति भी महसूस की गई है कि अनिभज्ञ, अशिक्षित और अभावग्रस्त महिलाएं और किशोरियां मासिक धर्म के दौरान पुराने मोजे, गंदे कपड़े, अखबार, भूसी, रेत, पेड़ के पत्ते और यहां तक की राख का भी प्रयोग करती हैं। साथ ही इसका उचित निपटान न करते हुए इसे अक्सर गांव के तालाबों में या फिर खुले में फेंक दिया जाता है, जो कि इंसान और जानवरों में संक्रमण के जोखिम के रूप में उजागर होता है। इस दिशा में गंभीरता से सोचना इसलिए भी जरूरी है कि जहां यह किशोरियों के भय, चिंता और तनाव से संबंधित है, वहीं स्वच्छता, स्वास्थ्य और पर्यावरण से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी मासिक धर्म की स्वच्छता संबंधी मुद्दे को स्वास्थ्य और मानवाधिकार के रूप में मान्यता दी है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक आज भी लाखों किशोरियों और महिलाओं के लिए ‘पीरियड पावर्टी’ एक वास्तविकता है। ‘पीरियड पावर्टी’ मासिक धर्म से संबंधित आवश्यक और गुणवत्तापूर्ण सेनेटरी उत्पादों को खरीदने में असमर्थता से संबंधित है। इस दिशा में प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना के तहत मात्र ढाई रु पये में पूरी तरह ‘आक्सो-बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी नेपकिन’ सुविधा को उपलब्ध कराने की योजना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
हाल ही में केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने ‘मासिक धर्म स्वच्छता अभियान’ की शुरु आत की है। वैश्विक स्तर पर भी इस मसले पर सकारात्मक प्रयास जारी हैं। यद्यपि सरकारी और गैर सरकारी संगठनों एवं व्यक्तियों द्वारा विभिन्न स्तरों पर सराहनीय प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन ये तब तक अधूरे हैं जब तक एक ठोस और सार्थक ‘राष्ट्रीय नीति’ न विकसित की जाए। इस अवश्यम्भावी प्राकृतिक प्रक्रिया के कारण किशोरियों और महिलाओं की शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय, श्रम, स्वास्थ्य, मानवाधिकार, सम्मान इत्यादि जीवन के सभी आयामों से संबंधित असुविधा और क्षति को पूरा करने की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए सरकार, नीति नियोजक संस्थाएं, राज्य, शैक्षिक संस्थाएं, पड़ोस और परिवार आगे आएं।