मानद का मान

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राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने डॉ. यशवंत सिंह परमार उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी की ओर से दी जा रही डॉक्टर ऑफ साइंस की मानद उपाधि लेने से इनकार करके एक अनुकरणीय कदम उठाया है। यह कहते हुए कि ‘वह स्वयं को इस गुरुतर उपाधि के योग्य नहीं मानते हैं’, राष्ट्रपति ने स्कूलों-विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं की ओर से दी जाने वाली डिग्रियों की प्रतिष्ठा और मर्यादा को भरसक बचाने की पहल की है।

दुर्भाग्यवश जिनके सम्मान का ख्याल खुद शिक्षण संस्थानों के अधिकारियों को ही नहीं है। दरअसल, मानद उपाधि देने की परम्परा अंग्रेजों ने शुरू की थी।  उनके अधीन रहे भारत में भी इसका ज्यों-का-त्यों विकास हुआ। निजी या सार्वजनिक क्षेत्र के विश्वविद्यालय स्तर के शिक्षण संस्थान ऐसे व्यक्ति या नेता को मानद उपाधि दे कर सम्मानित करते हैं, जिनके पास कोई औपचारिक डिग्री भले न हो, लेकिन किसी क्षेत्र में उनका विशिष्ट योगदान रहा है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था का यह अच्छा कदम था, जिसके तहत समाज, साहित्य, विज्ञान, संगीत, कला-संस्कृति और राजनीति के क्षेत्र में असाधारण योगदान देने वालों को मानद उपाधि देकर सम्मानित किया जाता है। लेकिन धीरे-धीरे यह अच्छी परम्परा भी पतित हो गई और उसका दुरुपयोग होता गया। और अब यह मानद उपाधि केवल उच्च पदों पर आसीन प्रभावशाली व्यक्तियों को ही दिया जाने लगा है।

इस श्रेणी में कुछ प्रभावशाली व्यक्ति भी रहे हैं, जिनका वास्तव में किसी भी क्षेत्र में कोई विशिष्ट योगदान नहीं रहा है। अब तो मानद उपाधि देने की परम्परा सत्ता को साधने के अपने निहित स्वार्थ से ज्यादा जुड़ गई है। कुछ संस्थान मानद को इस नजरिये से बांटते हैं कि वे बदले में उस नेता या मंत्री से कुछ पा सकें। ऐसा भी देखने को मिल रहा है कि मानद उपाधियां पैसे देकर भी खरीदी जाती हैं।

ऐसे पतन-उन्मुख माहौल में राष्ट्रपति ने उपाधि को ठुकरा कर न केवल उसकी गुरुता का उचित आदर किया है बल्कि इसके सर्वथा अयोग्य उन राजनीतिकों को इन उपाधियों से परे रहने का संदेश दिया है, जो कैसे भी इन्हें हथियाने को लालायित रहते हैं। दरअसल, उपाधियां साधना से अर्जित की जाती हैं, वे इसके साधकों को ही दी जानी चाहिए। उम्मीद है, देश के अन्य उच्च पदस्थ और प्रभावशाली लोग महामहिम का अनुकरण करेंगे। इसलिए ही देश के प्रमुख शिक्षाविदें ने राष्ट्रपति के निर्णय का स्वागत किया है।