महंगाई तो बढ़ेगी

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भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर और रिवर्स रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कतई अनपेक्षित नहीं है। रिजर्व बैंक के मुख्य फोकस में से एक अभी महंगाई दर को नियंत्रण में रखना है। यह अनुमान पहले से था कि इस बार रेपो दर 6.5 प्रतिशत और रविर्स रेपो दर 6.75 प्रतिशत हो जाएगा।  इससे पहले जून में आरबीआई ने चार साल से भी ज्यादा समय बाद दर बढ़ाया था। जून में रिजर्व बैंक ने कहा था कि भविष्य में दर बढ़ाने का कदम कृषि उपज के समर्थन मूल्य, तेल मूल्यों की स्थिति, सरकारी कर्मचारियों को ज्यादा भत्तों आदि के असर से तय होगा।

कच्चे तेल के दाम बढ़ने से पेट्रोल और डीजल की कीमतें भी बढ़ी हैं। इसका असर भी महंगाई पर हो रहा है। फसल के समर्थन मूल्य बढ़े हैं। इन सबको रिजर्व बैंक नजरअंदाज नहीं कर सकता था। जून में यह भी माना गया था कि इस वित्तीय वर्ष में खुदरा महंगाई दर अप्रैल-सितम्बर के बीच 4.8-4.9 प्रतिशत और अक्टूबर-मार्च के बीच 4.7 प्रतिशत रह सकती है। उसने केंद्र सरकार के कर्मचारियों के भत्ते से पड़ने वाले असर को इसमें शामिल किया था और महंगाई के सिर उठाने का अंदेशा जताया था। यह ठीक है कि इस वृद्धि से आने वाले समय में बैंकों से कर्ज लेना महंगा हो सकता है।

मासिक किश्त बैंक बढ़ सकते हैं। किंतु केंद्रीय बैंक के पास कोई चारा नहीं था। उसे सम्पूर्ण परिस्थितियों पर विचार करना होता है। रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल की अध्यक्षता में हुई छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने समीक्षा बैठक के तीसरे दिन यह फैसला किया। इसका मतलब हुआ कि इस पर काफी गहन विमर्श हुआ है। इसमें केवल एक सदस्य ने वृद्धि के विरु द्ध मत दिया था। इसके साथ ही मौद्रिक नीति के रु ख को भी तटस्थ बनाए रखा है।

यह अनुमान है कि जुलाई- सितम्बर तिमाही के लिए खुदरा मुद्रास्फीति दर 4.2 प्रतिशत, जबकि वर्ष की दूसरी छमाही के दौरान यह 4.8 प्रतिशत तक जा सकता है। जून में किए गए अनुमान से यह थोड़ा अंतर है। रिजर्व बैंक का मानना है कि अगर महंगाई दर 4 प्रतिशत के आसपास रहता है तो यह संतोषजनक होगा। देखते हैं कि 3 अक्टूबर को होने वाली अगली मौद्रिक समीक्षा बैठक में रिजर्व बैंक क्या करता है। उस समय भी महंगाई दर इसका मुख्य निर्धारक होगा। मौद्रिक समीक्षा निष्कर्ष का एक संतोषजनक पहलू यह है कि विकास दर को 7.5 से 7.6 प्रतिशत तक रहने की बात की गई है।