महंगाई का डोज

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पेट्रोल, डीजल और बिना सब्सिडी वाली रसोई गैस के मूल्यों में लगातार बढ़ोतरी यदि देशव्यापी चिंता का विषय है, तो यह अकारण नहीं है। इससे आम लोगों हो रही परेशानी को कोई भी महसूस कर सकता है।

कांग्रेस ने इसके खिलाफ पूरे देश में सड़कों पर उतरने का ऐलान करके जता दिया है कि वह सरकार को घेरने के लिए कमर कस रही है। हालांकि जब वह सत्ता में थी, वह भी बढ़ती कीमतों पर काबू नहीं कर पाई थी। किंतु विपक्ष में रहते हुए भाजपा इसी तरह उसे विरोध का मुद्दा बनाती रही। वैसे, राजनीतिक विरोध प्रदशर्न अब प्रतीकात्मक हो गया है। सरकारें सामान्यत: विरोधी दलों के ऐसे प्रदशर्नों को बहुत गंभीरता से नहीं लेतीं। कारण साफ है। कोई भी राजनीतिक दल अब लंबे समय तक आंदोलन नहीं करता। किंतु केंद्र सरकार को यह समझना होगा कि इससे देशव्यापी असंतोष पैदा हो रहा है।

सरकार अभी तक लोगों के गले में यह बात उतारने में सफल नहीं है कि बढ़ते मूल्यों को थामना उसके वश की बात नहीं है। यह सच है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मूल्यों में बढ़ोतरी और ओपेक देशों द्वारा उत्पादन नहीं बढ़ाना इसके मुख्य कारण है। इस कारण के उपकारण कई हैं। उन पर भारत का कोई वश नहीं। चूंकि रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिर रहा है, इसलिए इसका भी असर है।

इसके साथ यह भी सच है कि केंद्र व राज्यों का उत्पाद शुल्क भी इसमें प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। केंद्र ने तो उत्पाद शुल्क घटाने से हाथ खड़ा किया ही है, कोई राज्य भी अपनी ओर से इसे कम करने को तैयार नहीं है। मजे की बात देखिए कि जो राज्य स्वयं उत्पाद शुल्क घटाने के लिए तैयार नहीं हैं, वो भी केंद्र की आलेचना कर रहे हैं। वास्तव में कीमत एक ही स्थिति में कम हो सकती है, जब राज्य व केंद्र, दोनों उत्पाद शुल्क कम करें। यह कहना आसान है किंतु इससे वित्तीय स्थिति असंतुलित होने का खतरा है। राज्यों की आय का एक मुख्य स्त्रोत पेट्रोल और डीजल से मिलने वाला उत्पाद शुल्क है।

जो इसे वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी के अंतर्गत लाने की मांग कर रहे हैं, वे भूल रहे हैं कि कोई राज्य इसके लिए तैयार नहीं है। जीएसटी परिषद में सारे फैसले सर्वसम्मति से होते हैं। इसलिए इसकी संभावना बिल्कुल नहीं है। राजनीति के लिए कोई दल या नेता ऐसा बयान भले दे दे, वह भी सरकार में होने पर ऐसा नहीं कर पाएगा। किंतु केंद्र सरकार को जनता के कोपभाजन से बचना है, तो उसे कुछ न कुछ करना ही होगा।