ममता की मुहिम

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस तरह पिछले कुछ दिनों से राजधानी दिल्ली में नरेन्द्र मोदी विरोधी मोर्चा बनाने के प्रयास में लगी हैं, उसके राजनीतिक परिणामों के बारे में अभी कोई टिप्पणी करना कठिन है।

हालांकि इसमें दो राय नहीं कि भाजपा और मोदी विरोधी दलों में यह सोच घनीभूत हो चुकी है कि 2019 लोक सभा चुनाव में यदि उनको चुनौती देना है तो मिलकर मुकाबला करना होगा। ममता का फार्मूला है कि राज्यों में एक ओर भाजपा तो दूसरी ओर सारे दल एक साथ हों तभी भाजपा को पराजित किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के दो लोक सभा उपचुनाव में सपा-बसपा के साथ से भाजपा की पराजय ने इस विचार को बल दिया है।

किंतु यह कहना जितना आसान है व्यवहार में उतारना उतना ही कठिन। स्वयं ममता पहले कांग्रेस को लेकर सकारात्मक नहीं थी। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव से कोलकाता में मुलाकात के बाद गैर भाजपा गैर कांग्रेसी मोर्चा खड़ा करने का बयान आया था। अब ममता ने सोनिया गांधी से मुलाकात कर यह संदेश दिया है कि विपक्षी दलों को एकत्रित करने के प्रयासों में कांग्रेस उनके लिए अछूत नहीं है।

प्रश्न है कि क्या वो चन्द्रशेखर राव को इसके लिए तैयार कर पाएंगी? क्या तेलुगू देशम कांग्रेस के साथ मिलकर आंध्र प्रदेश में कभी चुनाव लड़ सकता है? क्या स्वयं ममता पश्चिम बंगाल में वामदलों और कांग्रेस दोनों के साथ गठबंधन को तैयार होंगी? और क्या वामदल ममता के साथ चुनाव में जाना चाहेंगे? ऐसे अनेक प्रश्न हैं, जिनका उत्तर ऐसे प्रयासों के कमजोर परिणामों की ओर इशारा करता है।

दूसरे; मोदी विरोधी संभावित मोर्चा में ऐसे अनेक दलों का नाम दिख रहा है, जिनका जनाधार एक राज्य के बाहर है ही नहीं। यानी ये एक दूसरे को मत नहीं दिला सकते। बावजूद इसके कहा जा सकता है कि ममता की मुहिम से एक माहौल बना है। देखना होगा कि आगे यह किसी मोर्चा का आकार लेता है या नहीं। या लेता है तो उसमें कितने दल होते हैं?

भाजपा सार्वजनिक तौर पर जो कहे मगर अंदर से उसकी चिंता बढ़ रही होगी। वास्तव में अगर कुछ राज्यों में भी कई दल एक साथ सीटों पर तालमेल करके भाजपा के विरु द्ध चुनाव लड़ते हैं तो उसके लिए चुनौती बढ़ जाएगी। पता नहीं वह इस राजनीतिक स्थिति के लिए कितनी तैयार है? विरोधियों की मोर्चाबंदी की कोशिशों के समानांतर उसे जितना सक्रिय उसे दिखना चाहिए नहीं दिख रही है। उसे खतरे की घंटी को सुनना चाहिए।