ममता की मुखरता

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी असम के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के मसौदे पर काफी मुखर और आक्रामक हैं। इस मुद्दे पर कांग्रेस उनके साथ खड़ी है। दोनों दल इस बात पर सहमत हैं कि एनआरसी के जरिये भाजपा और उसकी सरकार ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है।

लेकिन केंद्र सरकार पर ऐसे आरोप लगाने वालों को ध्यान रखना चाहिए कि 2005 में मनमोहन सिंह सरकार ने एनआरसी को अद्यतन करने की घोषणा की थी और 2015 में सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में यह काम शुरू हुआ। पिछली तीस जुलाई को एनआरसी का जो मसौदा जारी हुआ, वह अंतिम स्वरूप नहीं है। लेकिन ममता बनर्जी ने गृह युद्ध छिड़ जाने की धमकी दे डाली, हालांकि बाद में उन्होंने अपने इस विवादित बयान से पल्ला झाड़ लिया। दरअसल, यह सच है कि एनआरसी का मसला किसी-न-किसी रूप में वोट बैंक को प्रभावित करता है।

यही वजह है कि 2005 में तब के पीएम मनमोहन सिंह की घोषणा के बाद भी दस साल तक असम की सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार एनआरसी को अद्यतन करने की पहल नहीं की। बांग्लादेशी घुसपैठिये भाजपा का पुराना राजनीतिक मुद्दा है। 2016 के असम चुनाव के घोषणा पत्र में भी इस मुद्दे का उल्लेख था। सरकार बनने के तुरंत बाद उसने इस पर कार्रवाई शुरू की। जब मसौदा सामने आया तो ममता बनर्जी और कांग्रेसी नेताओं के हाथों के तोते उड़ गए। असम के बाद पश्चिम बंगाल में भी बांग्लादेशी घुसपैठिये अच्छी-खासी तादाद में है।

इस सूबे में सत्तारूढ़ वामपंथी गठबंधन को जब तक इन घुसपैठियों का वोट और समर्थन मिलता रहा, तब तक इस मसले पर ममता बनर्जी का रुख अलग था। उस समय वह एनडीए में शामिल थीं। और नागरिकता प्रकरण पर चर्चा के लिए समय न दिये जाने से इतनी उग्र और नाराज थीं कि सदन से इस्तीफा तक दे दिया था।  अब जबकि बंगाल में उनकी सरकार है और घुसपैठियों के वोट और समर्थन उनको प्राप्त हो रहा है तो उनका रुख कुछ और हो गया है। अगर भारत में अवैध रूप से रहने वाले यहां के नागरिक नहीं हैं तो उन्हें वापस भेजा ही जाना चाहिए।

वोट बैंक के लालच में देश की अखंडता और संप्रभुता से समझौता करने वाले देशप्रेमी नहीं हो सकते। हालांकि ये घुसपैठिये असम, पश्चिम बंगाल तक ही सीमित नहीं हैं, वे लाखों की तादाद में बिहार, दिल्ली सहित अन्य राज्यों में भी अवैध रूप रह रहे हैं। इनकी पहचान करने के लिए एनआरसी पर कार्यवाही होनी चाहिए।