भूख से मौत

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देश की राजधानी दिल्ली में रिक्शाचालक पिता मंगल की तीन बच्चियां आठ साल की शिखा, चार साल की मानसी और दो साल की पारूल गरीबी, कुपोषण और भूख के कारण मौत की नींद सो गई।

भूख से इन तीनों बच्चियों की मौत भयानक त्रासदी है। इससे महज सरकारी और प्रशासनिक तंत्र की विफलता कहकर अपनी आंखें नहीं मूंदी जा सकती। वास्तव में यह सामाजिक मूल्यों के क्षरण का प्रतीक है।

इसके बारे में समाजशास्त्रियों को विचार-विमर्श करने की जरूरत है। उदारीकरण और बाजारवाद ने जिन मूल्यों को जन्म दिया है और जिस तरह की स्वार्थी और क्रूर समाज की निर्मिति हो रही है, शायद उसी की यह परिणति है। पिछले कुछ वर्षो से इस तरह की पाशविक-सामाजिक प्रवृत्ति तेजी से विकसित हुई है।

स्वस्थ सामाजिक संरचना में अपने पड़ोसियों की भी दुख-दर्द का ख्याल रखा जाता है। इसे ही सामुदायिक भावना कहते हैं। किसी भी संकटग्रस्त परिवार की मदद के लिए पूरा समाज आगे आकर खड़ा हो जाता है। दया और करुणा जैसे सामाजिक मूल्य ही स्वस्थ समाज का चरित्र है।

इन्हीं गुणों और मूल्यों के कारण दिव्यांग और सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति की मदद करते हैं। लेकिन इन मूल्यों का तेजी से क्षरण होने के कारण भारतीय समाज का चेहरा विद्रूप होता जा रहा है। इस भयानक त्रासदी के बाद हमें यह विश्वास ही नहीं होता कि यह देश बुद्ध का है, गांधी का है और अंबेडकर का है।

पूर्वी दिल्ली के मंडावली में रहने वाला मंगल इन दिनों बेरोजगार हो गया था। लुटेरों ने उसका रिक्शा लूट लिया था। बेरोजगारी के कारण मकान भाड़ा देने की बात तो दूर थी, वह दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पा रहा था। यह जानते हुए भी कि मंगल बेरोजगार है, मकान-मालिक ने भाड़ा न चुकाने के कारण उसे परिवार सहित घर से बाहर निकाल दिया था। यह क्रूरता की हद है।

यह बहुत डरावनी स्थिति है और इसपर समाजसेवी संगठनों को भी आगे आकर सामाजिक विफलता के कारणों को समझने और समझाने की जरूरत है। लेकिन जैसा आमतौर पर होता रहा है, इस भयानक त्रासदी को लेकर सियासी दल रोटियां सेंकने लगे हैं।

दिल्ली प्रदेश में राजनीति करने वाले नेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करना शुरू कर दिए हैं। लेकिन सवाल यह कि क्या नेता इस त्रासदी के कारणों की गहराई से पड़ताल कर पाएंगे? वास्तव में इस त्रासदी को सामाजिक विफलता के रूप में देखने की जरूरत है।