भीड़तंत्र का खतरा

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पिछले कुछ वर्षो से भीड़ द्वारा की जा रही हिंसा के रूप में पाशविक सामाजिक प्रवृत्ति का उभार तेजी से हो रहा है। विशेषकर गोरक्षा के नाम पर लोग कानून को अपने हाथ में लेकर महज शक के आधार पर किसी की भी हत्या कर दे रहे हैं। देश की सर्वोच्च अदालत ने भीड़ की बढ़ती हिंसा और हत्या की घटनाओं पर चिंता जताते हुए कहा है कि गोरक्षा के नाम पर कोई भी व्यक्ति कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकता।

भीड़ द्वारा की गई हिंसा और हत्या कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, अपराध है, और इसे रोकना राज्यों का दायित्व है। हालांकि भारतीय समाज के सुदूर अंचलों में पहले भी भीड़ द्वारा हिंसा की जाती रही है। खासकर विधवा महिलाओं की संपत्ति हड़पने के लिए उन्हें डायन बताकर हिंसा किए जाने के तमाम मामले प्रकाश में आते थे। लेकिन इस पाशविक प्रवृत्ति का जिस तेजी से उभार हो रहा है, वह किसी भी सभ्य और आधुनिक लोकतांत्रिक समाज के माथे पर कालिख है। इस तरह की घटनाएं भारतीय समाज की प्रगतिशीलता के दावे को संदिग्ध बनाती हैं।

लोकतंत्र द्वारा शासित समाज यदि कानून को अपने हाथ में लेकर फैसले लेने लगे तो लोकतंत्र को भीड़तंत्र में तब्दील होने का खतरा साफ तौर पर दिखाई देने लगता है। चिंता और हैरानी की बात है कि गोरक्षा के नाम पर हिंसा करने वाले असामाजिक तत्वों के हौसले इतने बढ़ गए हैं कि अब वे बच्चा चोरी का आरोप लगाकर लोगों की हत्याएं कर रहे हैं। कुछ लोगों का आरोप है कि हिंसा धर्म और जाति को निशाना बनाकर हो रही है। अगर यह सच है तो इसे सख्ती से रोकने की जरूरत है क्योंकि इससे सामाजिक विघटन का खतरा है।

हालांकि भीड़ की हिंसा को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल सभी राज्यों को ठोस कदम उठाने का निर्देश दिया था और साथ ही सभी जिलों में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को नोडल अफसर नियुक्त करने को कहा था। लेकिन इस निर्देश का पालन नहीं हुआ, जिसके कारण हिंसक घटनाओं का ग्राफ बढ़ता गया।

बहरहाल, अच्छी बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करेगा। सरकार ने भी सामाजिक हिंसा को बढ़ावा देने वाले संदेशों के प्रसार को तत्काल प्रभाव से रोकने के लिए व्हाट्सएप को चेतावनी जारी की है। उम्मीद है कि सरकार की सक्रियता से भीड़ की हिंसा पर प्रभावी अंकुश लग पाएगा।