भारत बंद का संदेश

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इसकी गिनती करने की आवश्यकता नहीं कि कांग्रेस की ओर से आहूत भारत बंद का कितनी पार्टी का समर्थन मिला? महत्त्वपूर्ण यह है कि किन पार्टयिों का समर्थन नहीं मिला। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि इस भारत बंद से हासिल क्या हुआ? जो हासिल होगा क्या वह बंद के बिना नहीं हो सकता था? पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के बढ़ते मूल्यों के खिलाफ यह बंद था।

कोई भी समझ सकता है कि इसका उद्देश्य राजनीतिक था। कांग्रेस एक आक्रामक विपक्ष की भूमिका में ही दिखना नहीं चाहती, धीरे-धीरे नरेन्द्र मोदी और भाजपा विरोधी राजनीति की धुरी बनने की रणनीति पर भी काम कर रही है। उसे मालूम है कि मूल्य में हो रही बढ़ोत्तरी को रोकना सरकार के वश में नहीं। अगर थोड़ा शुल्क घटा दिया जाए तो उससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा एवं देश की वित्तीय व्यवस्था पर गहरा नकारात्मक असर होगा।

अगर केंद्र सरकार अपने उत्पाद शुल्क में थोड़ी कटौती करती है तो भी यह इसलिए नहीं कि वह बंद से डर गई है या दबाव में आ गई है। इस समय पेट्रो पदार्थों का मूल्य बढ़ना देश में एक बड़ा मुद्दा बन गया है। सरकार के लिए राजनीतिक रूप से यह जोखिम भरा है। वस्तुत: कांग्रेस या विपक्षी दलों को विरोध करने का अधिकार है, लेकिन उसके लिए भारत बंद करना जरूरी नहीं था।

इससे देश का नुकसान होता है। कांग्रेस ने अन्य दलों से राय लिये बगैर बंद आयोजित कर दिया, इसलिए विपक्षी एकता की जगह बिखराव का संदेश ज्यादा गया। ममता ने मूल्य बढ़ने के विरोध को सही बताते हुए बंद को गलत बताया, बीजद ने अपने को अलग रखा, सपा और बसपा का कोई नेता राहुल के साथ मंच पर नहीं आए..आम आदमी पार्टी ने बंद का समर्थन नहीं करने की घोषणा की थी।

हालांकि आम आदमी पार्टी के नेता राहुल के मंच पर गए। भाजपा इससे यकीनन प्रसन्न होगी कि चलो सारी विपक्षी पार्टयिां एक साथ नहीं आ सकी। कांग्रेस यदि सबसे राय विचार कर सरकार विरोध का कार्यक्रम बनाती तो हो सकता है उसमें भारत बंद का निर्णय नहीं होता, मगर सरकार के खिलाफ विपक्ष एकजुट दिख सकता था।

राजनीतिक लाभ-हानि से अलग विचार करने की जरूरत है कि आखिर भारत बंद करके कोई दल या समूह क्या लक्ष्य हासिल करता है? बंद के दौरान जितनी हिंसा और तोड़फोड़ हुई, उसमें लगा ही नहीं कि ये भारत के ही लोग हैं, जो अपने देश की संपत्ति के प्रति कोई जिम्मेदारी भी समझते हैं। यह दुखद है। आप विरोध करिए किंतु भारत बंद से बचिए।