भारत की अपेक्षा

,

नेपाल के प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली चीन की छह दिवसीय यात्रा पर हैं। चीन सरकार द्वारा नियंत्रित अखबार ग्लोबल टाइम्स ने इस यात्रा पर तंज कसते हुए लिखा है कि भारत को ओली की यात्रा से निराश नहीं होना चाहिए क्योंकि नेपाल में उसका प्रभाव कम नहीं होगा। नेपाल एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र है, और नेपाल समेत किसी भी देश की संप्रभुता और अखंडता का सम्मान करना भारत की पारंपरिक नीति रही है।

इस राह पर चलते हुए नई दिल्ली किसी देश के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करती। फिर, ओली की यह दूसरी चीन यात्रा है। पहली यात्रा मार्च, 2016 में हुई थी। वह जब गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे थे। इसलिए उनकी यह यात्रा भारत के लिए निराशा की कोई वजह नहीं हो सकती। हां, इतना जरूर है कि भारत और नेपाल की सीमाएं खुली हुई हैं, इस कारण दोनों देशों की सुरक्षा व्यवस्था परस्पर जुड़ी हैं।

अलबत्ता, भारत कभी नहीं चाहेगा कि नेपाल भारत विरोधी गतिविधियों का केंद्र बने। ओली चीन समर्थक माने जाते हैं। वह चीन की महत्त्वाकांक्षी ‘वन बेल्ट, वन रोड’ संपर्क परियोजना के साथ हैं। उन्होंने एक साक्षात्कार में स्वीकार किया है कि चीन के साथ दो साल पहले हुए करार में बेल्ट और रोड परियोजना के ढांचे के तहत सहयोग को लेकर समझौता ज्ञापन (एमओयू) को लागू करने के लिए नेपाल प्रतिबद्ध है।

नेपाली प्रधानमंत्री का रुख भारत को असहज करने वाला है क्योंकि चीन की यह परियोजना भारत की संप्रभुता और अखंडता को रौंदने वाली है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विश्व मंच से इसका  विरोध करने से पीछे नहीं हटते। पिछले दिनों चीन में संपन्न शंघाई सहयोग परिषद की बैठक में भी मोदी ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया था।

चूंकि नेपाल की भू-राजनीतिक स्थिति ऐसी है कि चीन चाहकर भी नेपाल की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं बना सकता। भारत पर उसकी निर्भरता बनी रहेगी। भारत-नेपाल के बीच सदियों से धार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। दोनों देशों के सुरक्षा हित भी परस्पर जुड़े हुए हैं। लिहाजा नेपाल को चीन के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने की दिशा में भारत के सुरक्षा हितों का ध्यान रखना होगा। प्रधानमंत्री ओली से भारत इतनी ही अपेक्षा रखता है।