भाजपा कार्यकारिणी : जनतंत्र विरोधी मिजाज

राजेंद्र शर्मा,

भाजपा 2019 के आम चुनाव के लिए और जाहिर है कि इस साल के आखिर में होने वाले तेलंगाना समेत पांच राज्यों के विधानसभाई चुनाव के लिए अपने नये नारे चाहे अभी आजमा ही रही हो पर उसने अगले चुनाव के लिए अपना चेहरा ही  नहीं बल्कि अपना इकलौता नेता पक्के तौर पर खोज लिया है। यह संयोग नहीं है कि ‘अजेय भारत, अटल भाजपा’ का इस पार्टी का नया नारा भी भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की नई-दिल्ली में हुई दो-दिनी बैठक के आखिर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संबोधन में ही दिया गया। हालांकि शुरू में प्रस्तावित नारे के मुकाबले भाजपा की ‘अजेयता’ घोषणा करने में अंतत: संकोच किया गया लेकिन इसका यह अर्थ हरगिज नहीं है कि भाजपा की बैठक में कोई कम अहंकार देखने को मिला।  
यह अहंकार इस तरह की शेखी तक भी जाता है कि 2019 का चुनाव तो भाजपा जीतेगी ही जीतेगी और 2014 के चुनाव से भी बड़े बहुमत से जीतेगी। और उसने 2019 का चुनाव जीत लिया तो पचास साल तक कोई उसे हिला नहीं पाएगा। वास्तव में मोदी-शाह के नेतृत्व में भाजपा ने ऐसी शेखी मारने तथा हवाई दावे करने को अपने प्रचार का प्रमुख हथियार बना लिया है। सत्ताधारी पार्टी गोयबल्स की सुयोग्य शिष्य नजर आती है। जाहिर है कि इस तरह के दावे यही मानकर किए जाते हैं कि नासमझ जनता को तो कुछ भी समझाया जा सकता है। इसीलिए हालांकि गुजरात से लेकर कर्नाटक तक एक के बाद एक सभी महत्त्वपूर्ण चुनावों में नतीजों के जरिए जनता ने अमित शाह के अतिरंजित दावों को स्पष्ट नकारा है, इसके बावजूद भाजपा अध्यक्ष को बार-बार ऐसे दावे करने में कोई संकोच नहीं होता।
वह तो बेधड़क उत्तर प्रदेश में भी पिछली बार की 72 से दो सीट फालतू जीतने के दावे करते फिरते हैं, जबकि सचाई यह है कि इस राज्य में उपचुनाव में लोक सभा की तीन में से तीनों सीटें हारकर भाजपा सीटों के पिछली बार के आंकड़े में तीन की कमी पहले ही कर चुकी है। लेकिन भाजपा खुद अपनी दपरेक्तियों की पोल खोल देती है, जब मोदी-शाह की जोड़ी पूरा ध्यान विपक्ष पर निराधार हमले करने में लगाए नजर आती है। 2014 से भी बड़े बहुमत से जीतने, नौ करोड़ कार्यकर्ताओं तथा योजनाओं के लाभों के सहारे तेतीस-चौंतीस करोड़ मतदाताओं को अपने पीछे लेने, मोदी की लोकप्रियता रेटिंग चार साल बाद भी 70 फीसद से ऊपर बनी रहने, कांग्रेस के शासन के 48 साल का मुकाबला मोदी के राज के 48 महीने से करने आदि की तमाम डींगें हांकने के बावजूद पूरी बैठक की चर्चा यही दिखाने पर केंद्रित थी कि विपक्ष के पास कोई ‘नेता, नीति और नीयत ही नहीं है’। वह तो सिर्फ  मोदी को ‘रोकना’ चाहता है! दिलचस्प यह कि हालांकि अमित शाह ने अपने अध्यक्षीय भाषण में ही विपक्षी एकता के प्रयासों को भाजपा के हिसाब से बिल्कुल बेमानी करार देकर खारिज कर दिया था, इसके बावजूद मोदी ने बैठक के दूसरे दिन के अपने संबोधन में ज्यादा समय विपक्षी गठबंधन के विचार पर हमला करने में ही लगाया। आखिर, क्यों? इसलिए कि मोदी-शाह जोड़ी बखूबी जानती है कि अगले चुनाव की तो बात ही क्या करना, 2014 के आम चुनाव में भाजपा की प्रकटत: ‘जबर्दस्त जीत’ भी एक-तिहाई से कम वोट पर टिकी हुई थी यानी दो-तिहाई वोट भाजपा के खिलाफ पड़े थे।
इस वोट का एक हद तक एकजुट होना भी, मोदी के राज के खिलाफ जनता  के सभी हिस्सों के बीच तेजी से बढ़ते असंतोष के साथ जुड़कर, आसानी से चुनाव की बाजी पलट सकता है। इसीलिए सारी शेखी के बावजूद मोदी-शाह की जोड़ी विपक्ष को एकजुट करने के प्रयासों पर हमले करने, उन्हें अनैतिक बताकर बदनाम करने पर ही अपनी सबसे ज्यादा ऊर्जा लगाती है। इस क्रम में भाजपा बार-बार अपने तानाशाही मिजाज के सबूत देती है। ऐसा ही एक और सबूत पेश करते हुए भाजपा की कार्यकारिणी की बैठक में संसद के पिछले सत्र में आए अविश्वास प्रस्ताव से मोदी सरकार के बचे रह जाने का ढोल ही नहीं पीटा गया, बल्कि विपक्ष के मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखने पर ही हमला किया गया। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के हिसाब से तो विपक्ष के पास बहुमत न होने के बावजूद, अविश्वास प्रस्ताव को विचार के लिए स्वीकार किया जाना ही, विपक्ष के प्रति मोदी सरकार की भारी ‘उदारता’ का सबूत था! लेकिन भाजपा से, जो मोदी सरकार के हर तरह के विरोध को ही ‘अपराध’ बना देने पर तुली हुई है, ऐसे तानाशाहीपूर्ण रुख के सिवा और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? लेकिन जनतांत्रिक व्यवस्था में थोड़ा सा भी विश्वास रखने वाला व्यक्ति जानता है कि अविश्वास प्रस्ताव सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने और उसके खिलाफ विरोध दर्ज कराने का सर्वस्वीकार्य और आम-फहम हथियार है। लेकिन यह एक सुप्रीमो की अंध-भक्ति से संचालित जनतंत्र-विरोधी मिजाज का मामला है। दिलचस्प है कि अमित शाह ने खुद ही यह कहकर नरेन्द्र  मोदी को अपनी पार्टी के निरंकुश नेता के आसन पर बैठा दिया कि पूर्व-प्रधानमंत्री, ‘मनमोहन सिंह पार्टी के पीछे चलते थे, मोदी के पीछे पार्टी चलती है।’
याद रहे कि भाजपा, जो वैसे भी इस अर्थ में एक सामान्य जनतांत्रिक राजनीतिक पार्टी है ही नहीं, तो अंतत: बाहर से आरएसएस से संचालित पार्टी है। उस संघ से जो एक नेता के सिद्धांत पर चलता है। बहरहाल, वह अब तो न्यूनतम जनतांत्रिक सिद्धांत पर ही हमला करती नजर आती है कि अपने सदस्य समूह की इच्छा की अभिव्यक्ति के रूप में कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने बड़े से बड़े नेता से भी ऊपर होती है, और होनी भी चाहिए। अचरज नहीं कि ऐसी पार्टी के सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय की बैठक में पेट्रोल के दिनों-दिन बढ़ते दाम, रुपये के दिन पर दिन गिरते दाम आदि से लेकर तेजी से बढ़ती बेरोजगारी, भीड़ हत्याओं, अल्पसंख्यकों और दलितों पर बढ़ते हमलों, महिलाओं पर बढ़ते अत्याचारों तक, सरकार और देश के सामने खड़ी किसी भी चुनौती पर विचार तक करने की जरूरत नहीं समझी गई।
यहां तक कि इसकी कोई सफाई देने की भी जरूरत नहीं समझी गई कि ‘अच्छे दिन आएंगे’ के नारे को भुलाकर अब 2022 तक ‘न्यू इंडिया’ बनाएंगे का नया नारा क्यों देना पड़ रहा है? हां! ऐसे हरेक सवाल का एक ही जवाब सिखाया गया-पिछली सरकारों ने क्या किया था? भाजपा पैसे और मीडिया की ताकत के बल पर और ‘न्यू इंडिया’ के झूठे दिलासों के सहारे जनमत को किसी न किसी तिकड़म से मैनिपुलेट करने के ही भरोसे है। पर वो कहते हैं न कि काठ की हांडी बार-बार थोड़े ही चढ़ती है।