भागने की नौबत

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डोनाल्ड ट्रंप का सख्त वीजा नियम ताव दिखाने लगा है। इससे विशेषज्ञों के अमेरिका जाने और उनके पति/पत्नी को भी आजीविका पाना कठिन हो गया है। इस बार अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (यूएससीआईएस) की तरफ से सर्वाधिक दक्ष पेशेवरों को दिये जाने वाले एच-1बी वीजा में पिछले साल की तुलना में 43 से 51 फीसद की कमी की गई है।

इसके पहले होता आया था कि सक्षम पेशेवर एच-1बी वीजा पर अमेरिका जाते थे और उनके पति या पत्नी को एच-4 वीजा दे दिया जाता था, ताकि वे भी वहां योग्यता मुताबिक कोई काम कर सकें और महंगाई से बचते हुए अपनी गृहस्थी चला सकें। लेकिन इस साल ट्रंप प्रशासन एच-4 वीजा को रद्द करने जा रहा है।

इसके चलते 80,000 से लेकर1,00000 लाख लोग नौकरियों से बाहर हो जाएंगे, जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ने उदार रवैया अपनाते हुए इन वीजा की इन श्रेणियों के जारी रखा था। लेकिन ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ही इस व्यवस्था को बदलने की घोषणा की थी। उनका स्पष्ट मत था-बाई अमेरिकन/हायर अमेरिकन। तभी भारत समेत दुनिया ने इसे ट्रंप का संरक्षणवाद और आव्रजन के विरुद्ध कठोर नीति माना था। हालांकि तब भारत सरकार की ओर से कहा गया था कि वह इस मसले पर ट्रंप प्रशासन से बात करेगा। लेकिन उसकी बातचीत से कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आया है।

जाहिर है कि ट्रंप अमेरिकियों को वरीयता देकर बेरोजगारी बढ़ाने का रिस्क लेने के लिए तैयार नहीं हैं। हालांकि उनके इस निर्णय का अमेरिकी सांसद और कम्पनियां ही विरोध कर रही हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था भारतीय विशेषज्ञों पर टिकी है। दरअसल, फायदे उभयपक्षीय है। यह बात क्लिंटन से लेकर बुश और फिर ओबामा से लेकर खुद ट्रंप तक स्वीकार करते रहे हैं। लेकिन ट्रंप यह परिदृश्य बदलने पर आमादा हैं।

इसका असर भी अमेरिका में हुआ है क्योंकि वहां घरेलू श्रम बल मजबूत हुआ है। भारतीय उखड़ने लगे हैं। जाहिर है कि इससे भारतीय कम्पनियों और पेशेवरों व उनके परिवारों में गहरी निराशा है। पूर्व की स्थिति को लौटाने के लिए या तो भारत सरकार गंभीरता से परिणामदायक बात करे या फिर कुशल विशेषज्ञों के लायक अपने देश में ही प्रतिस्पर्धात्मक और उत्पादक वातावरण दे। यह अगर हो जाए तो इन्हें अन्य देशों की ओर मुंह उठाये न फिरना पड़ेगा और अपनी भी अर्थव्यवस्था रोजगारदायक हो जाएगी। इनमें किसी एक को तुरंत करना होगा।