बोतल में बंद ‘जहर’ पी रहे बच्चे

आईएएनएस, नई दिल्ली

भारत के अधिकतर राज्यों में प्लास्टिक कंपनियां स्कूली बच्चों के प्रयोग में आने वाली प्लास्टिक की बोतलों में पीवीसी (पाइपों में प्रयोग होने वाला प्लास्टिक) और बीपीए (बिसफेनोल ए नामक एक रसायन) जैसे रसायनों का प्रयोग करती हैं, जो उनकी सेहत के लिए बहुत ही हानिकारक है। इन बोतलों में पानी या फिर कोल्ड ड्रिंक पीने लायक न रहकर जहर बन जाता है, जिसका सेवन मासूम बच्चे ही नहीं बल्कि युवा भी दिन ब दिन अपने दैनिक जीवन में कर रहे हैं।

‘माई राइट टू ब्रीथ’ के संस्थापक सदस्य और पर्यावरणविद् जयधर गुप्ता ने कहा, गर्मी के दिनों में इनका प्रयोग अधिक होता है। जब यह बोतले कंपनियों से निकलकर दुकानों और गोदामों में जाने के लिए ट्रकों में लोड होती हैं तो उस वक्त बाहर का तापमान अगर 35-40 डिग्री है तो ट्रक के अंदर का तापमान 50 से 60 डिग्री होता है, इस दौरान विभिन्न कैमिकल से बनी प्लास्टिक की बोतलों में कैमिकल मिलना शुरू हो जाता है और सारा कैमिकल पानी या कोल्ड ड्रिंक में मिल जाता है और वह पानी जहर हो जाता है और वहीं पानी हम पी भी रहे हैं।

उन्होंने कहा, खाने से लेकर पीने की हर चीज में प्लास्टिक का उपयोग हो रहा है। हैरत की बात यह है कि प्रयोग होने वाली इस प्लास्टिक में 90 फीसदी से ज्यादा प्लास्टिक रिसाइकिल होने के लायक ही नहीं है। लोगों ने खुद ही इस हानिकारक चीज को अपने दैनिक जीवन में अपनाया है। पूरे भारत में हम रोजाना दो करोड़ प्लास्टिक की बोतलें कचरे में फेंकते हैं चाहे आप कहीं भी जाओं चाहे वह राजमार्ग हो, घूमने फिरने की जगह हो आपको हर जगह यह प्लास्टिक की बोतलें मिलेंगी। जयधर गुप्ता ने कहा, आठ से 10 प्रतिशत ही यह बोतलें रिसाइकिल होती हैं बाकी लैंडफिल साइटों पर फेंक दी जाती हैं। यह प्लास्टिक बायोडिग्रेडबल नहीं है यह हजारों साल तक हमारी दुनिया में रहेंगी।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की 2015 में आई रिपोर्ट बताती है कि भारत के प्रमुख 60 बड़े नगरों में प्रति दिन करीब 4,059 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। इस सूची में दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरू और हैदराबाद जैसे शहर शीर्ष पर हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि देश में प्रति दिन करीब 25,940 टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है।

जयधर ने कहा, पैकेजिंग उद्योग सबसे ज्यादा प्लास्टिक कचरा उत्पादित करते हैं। इनमें बोतल, कैप, खाने का पैकेट, प्लास्टिक बैग आदि शामिल हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार समुद्र को प्रदूषित करने वाले शीर्ष पांच प्रदूषकों में से चार पैकेजिंग उद्योग से निकलने वाला प्लास्टिक है।

प्लास्टिक के विकल्प के सवाल पर जयधर गुप्ता ने कहा, सबसे अच्छा विकल्प है कि जैसे हम पुराने जमाने में करते थे कि स्टील की बोतलें, थरमस इत्यादि। जब भी हम कहीं भी चले तो घर से इन्हें आप अपने साथ रखें। समस्या यहीं है कि हम लोग सहुलियतों के चक्कर में मारे जा रहे हैं जैसे जैसे लोग अमीर होते जाएंगे वह सहुलियतों के जाल में फंसते जाएंगे। यह बहुत आसान चीज है कौन ले जाएगा। इस सहुलियतों के कारण लोगों ने पर्यावरण की दुर्दशा कर दी है। उन्होंने कहा, आज से 20 से 25 साल पहले लोग बाजार से सामना लेने के लिए घर के थैले, बर्तन, इत्यादि चीजें ले जाया करते थे लेकिन आज के वक्त में लोगों ने इन चीजों को अपने साथ ले जाना बंद कर दिया है।

वह बाजारों से सामना प्लास्टिक की थैलियों में लाते हैं, जिन्हें रिसाइकिल किया ही नहीं जा सकता। लोगों को जानने की जरूरत है कि यह प्लास्टिक उनके लिए खतरा है। जयधर गुप्ता ने बाजारों में बिकने वाली प्लास्टिक की थैलियों पर उदाहरण देते हुए कहा कि कोई भी सब्जी वाला, छोटे दर्जे का दुकानदार प्लास्टिक में प्रयोग होने वाला माइक्रोन जैसी चीजों को नहीं समझता। प्लास्टिक में वही माइक्रोन काफी घातक सिद्ध होते हैं और आगे जाकर प्रदूषण बढ़ाते हैं।