बेहतरी की उम्मीद

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निश्चय ही यह राहत की बात है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच चीन के वुहान शहर में आयोजित दो दिवसीय अनौपचारिक शिखर वार्ता सकारात्मक माहौल में खत्म हुई।

यह दोनों देशों के नेताओं के बीच ऐसी पहली शिखर वार्ता थी जिसका न कोई एजेंडा निश्चित था और न जिसमें किसी तरह का घोषणा पत्र जारी करने की औपचारिकता थी। वार्ता के बाद भारत के विदेश सचिव विजय गोखले ने जो वक्तव्य दिए उनके अनुसार 4 मुद्दों पर सहमति बनी है। ये हैं-सीमा पर शांति, अफगानिस्तान में साथ काम करने, विशेष प्रतिनिधि नियुक्त करने और आतंकवाद पर सहयोग।

पिछले साल डोकलाम में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच 72 दिनों तक सैन्य गतिरोध चला था। ऐसे में सीमावर्ती इलाकों में शांति बरकरार रखने के महत्त्व को आसानी से समझा जा सकता है।

सीमा पर शांति के लिए सेनाओं के बीच संवाद को बढ़ाने के साथ कई मुद्दों पर सहमति के आलोक में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि चीन ने तत्काल यह तय किया है कि सीमा पर किसी प्रकार की अप्रिय स्थिति कायम न हो। जब तक इसके विपरीत संकेत नहीं आते हमें इसका स्वागत करना चाहिए। इसमें सहयोग करने में पीछे हटने का कोई कारण नहीं है।

हालांकि आतंकवाद पर सहयोग के संदर्भ में बहुत उम्मीद अभी जल्दबाजी होगी। इसका कारण पाकिस्तान के प्रति चीन का रवैया है। बावजूद इसके इस शिखर वार्ता के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है। यह एक नए तरह के शिखर संवाद की शुरु आत है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संबंधों की बेहतरी के लिए जो पांच सूत्रीय एजेंडा पेश किया उसकी तुलना प. नेहरू की पंचशील से की जा रही है। ये हैं, समान दृष्टिकोण, बेहतर संवाद, मजबूत रिश्ता, साझा विचार और साझा समाधान। शी ने कहा कि उनका देश मोदी के बताए पंचशील के इन नए सिद्धांतों से प्रेरणा लेकर भारत के साथ सहयोग और काम करने को तैयार है।

इसका मतलब है सैद्धांतिक रूप में मोदी की पांच सूत्रों से सहमति। जिस तरह से चीन ने पहल करके बंधनरहित शिखर वार्ता के लिए मोदी की मेजबानी की उसे अतीत के आलोक में आशंकाओं की नजर से ही देखते रहें तो फिर आगे बढ़ने का रास्ता बंद हो जाएगा। अच्छी बात है कि भविष्य में इस तरह के बिना औपचरिकता वाला संवाद जारी रखने पर सहमति बनी है। इससे ही धीरे-धीरे संबंधों की दिशा तय होगी।