बीसीसीआई : आरटीआई की नकेल

मनोज चतुर्वेदी,

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे में लाने का लंबे समय से प्रयास किया जा रहा है। लेकिन अब उसके ऊपर आरटीआई की नकेल कस गई है। केंद्रीय सूचना आयुक्त ने बीसीसीआई को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाने की घोषणा की है। साथ ही सूचना आयुक्त ने बीसीसीआई से 15 दिनों में आरटीआई  कानून के तहत 15 दिनों के भीतर ऑनलाइन और ऑफलाइन सूचनाएं देने की प्रणाली विकसित करने को कहा है।
बीसीसीआई के कुछ अधिकारी इस कार्रवाई के लिए बीसीसीआई के संचालन के लिए गठित प्रशासकों की समिति को मान रहे हैं। उनका कहना है कि सीआईसी की जुलाई में हुई सुनवाई में बीसीसीआई से पूछा गया था कि उन्हें आरटीआई के दायरे में क्यों नहीं आना चाहिए?  बीसीसीआई आरटीआई कानून के दायरे में आने से बचने के लिए अक्सर दलील देता रहा है कि वह सरकार से कोई वित्तीय मदद नहीं लेता है और स्वायत्त संगठन है, इसलिए उसके ऊपर यह कानून लागू नहीं होता। पर सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई मामले पर सुनवाई के दौरान उसकी इस दलील को नहीं माना था। अदालत का मानना था कि बीसीसीआई सरकार से टैक्स में छूट हासिल करता है। बीसीसीआई हमेशा पारदर्शी अंदाज में काम करने की बात कहता रहा है। अगर ऐसा है तो वह आरटीआई कानून के दायरे में आने से क्यों बचना चहता है। असल में दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड की बहुत सी जानकारियां हासिल करने पर लोगों की निगाह लगी हुई हैं। अब आप अंदाजा लगाएं कि करुण नायर जैसे खिलाड़ी को चयन समिति इंग्लैंड में टेस्ट सीरीज खेलने के लिए भेजती है और वहां खेलने का मौका दिए बगैर ही वेस्ट इंडीज के खिलाफ दो टेस्ट की घरेलू सीरीज में बाहर कर दिया जाता है। अगर बीसीसीआई आरटीआई  के दायरे में होता तो चयन समिति की बैठक में करुण नायर को लेकर क्या बात हुई, इस बारे में सवालों की लाइन लग सकती थी। बीसीसीआई चयन मामलों को हमेशा ही गोपनीय रखने का पक्षधर रहा है। उसने कभी भी यह बताने की जरूरत महसूस नहीं की है कि घरेलू क्रिकेट में ढेरों रन बनाने वाले और विकेट लेने वाले कुछ खिलाड़ी राष्ट्रीय टीम में क्यों नहीं स्थान बना पाते हैं? यही नहीं रंगत में खेलकर भी रोहित शर्मा जैसा क्रिकेटर टेस्ट टीम में क्यों नहीं स्थान बना पाता है? हां, इतना जरूर है कि बीसीसीआई के आरटीआई के दायरे में आते ही टीमों का चयन जरूर विवादास्पद बनने लगेगा। हमेशा जिस संगठन में ज्यादा पैसा होता है, उसे लेकर लोगों के मन में जिज्ञासा रहती ही है। बीसीसीआई भी इससे बचा हुआ नहीं है। देश में क्रिकेट को लेकर दीवानगी है। इसलिए इस खेल से जुड़े तमाम लोगों के दिमाग में तमाम तरह की जानकारियां पाने की हसरत भी रहती है। यह जानकारी भी लोग चाहेंगे कि बोर्ड के पदाधिकारियों पर कहीं खिलाड़ियों से ज्यादा पैसा तो खर्च नहीं किया जाता है। अभी पिछले दिनों इंग्लैंड दौरे पर गई टीम में अंबाती रायुडू चुने जाने के बाद भी नहीं जा सके थे। उन्होंने इस दौरे से ठीक पहले आईपीएल में जबर्दस्त प्रदर्शन किया था पर वह ‘यो यो टेस्ट’ पास नहीं कर पाने के कारण दौरे पर नहीं जा सके थे। बीसीसीआई के आरटीआई के दायरे में आने पर लोग यह भी जानना चाहेंगे कि चयन समिति टीम चुनने के बाद टीम प्रबंधन को अंतिम एकादश के बारे में भी बताती है या यह फैसला टीम प्रबंधन का होता है। टीम प्रबंधन विदेशी दौरों पर किस आधार पर अंतिम एकादश का चयन करता है। इस चयन को लेकर भी जानकारी मांगी जा सकती है।
बीसीसीआई असल में इन सवालों से बचने के लिए ही आरटीआई के दायरे में आने से बचता रहा है। मुझे याद है कि 2012 में तत्कालीन खेल मंत्री अजय माकन ने बीसीसीआई को खेल विधेयक के दायरे में लाने का भरसक प्रयास किया। लेकिन बीसीसीआई में उस समय राजनेताओं का दबदबा था और उन्होंने अजय माकन के प्रयासों पर पानी फेर दिया था। मौजूदा समय बीसीसीआई की मुश्किल यह है कि उसका संचालन सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त प्रशासकों की समिति के पास है, जिसके मुखिया विनोद राय हैं और वह हमेशा ही बीसीसीआई को आरटीआई के अंतर्गत लाने के पक्षधर रहे हैं। जस्टिस लोढा का तो कहना है कि लॉ कमीशन की सिफारिश 2016 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के हिसाब से ही थीं। इन सभी बातों से यह तो साफ लगता है कि बीसीसीआई का अब इसके दायरे से बचना थोड़ा मुश्किल है।