बहुत उम्मीद नहीं

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इमरान खान द्वारा प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के साथ दुनिया भर की नजरें उनकी ओर टिक गई हैं। सभी यह देखने के लिए उत्सुक हैं कि भूतपूर्व क्रिकेटर राजनीति की पिच पर किस प्रकार अपनी व्यूह रचना करता है। पाकिस्तान जिस तरह आतंकवाद का केंद्र बना हुआ है, उस कारण पूरी दुनिया की अभिरु चि उसकी नीतियों में रहती है।

चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बाद उन्होंने अपनी लंबी तकरीर में आतंकवाद के खिलाफ लड़ने का संकल्प तक व्यक्त नहीं किया था। इस कारण भी उत्सुकता बनी हुई है कि आखिर आतंकवाद के मामले में उनकी सरकार का रु ख क्या होता है? पूर्व सरकार वजीरीस्तान सहित सीमावर्ती इलाकों में आतंकवादियों के खिलाफ ऑपरेशन चला रही थी, अनेक आतंकवादियों को फांसी पर चढ़ाया गया।

इमरान उसे जारी रखते हैं या उसे बंद करते हैं यह देखना होगा। माना जा रहा है कि आतंकवादी समूहों ने भी चुनाव में उनकी मदद की है। इमरान सेना के चहेते हैं, इसलिए स्वतंत्र सुरक्षा नीति उनकी नहीं हो सकती। हालांकि अगर वो आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रु ख नहीं अपनाते हैं तो उन्हें विश्व के प्रमुख देशों का विरोध झेलना होगा। चीन भी इस मामले में इमरान की ज्यादा मदद नहीं कर सकता।

इमरान ने चीन के आर्थिक गलियारे का विरोध किया था, लेकिन चुनाव जीतने के साथ वे इस मामले पर चुप हो गए। जाहिर है, वे इसे जारी रखेंगे। भारत की दृष्टि से पाकिस्तान का महत्त्व उसकी विदेश नीति, आतंकवाद संबंधी नीति और रक्षा नीति के संदर्भ में ही है। विदेश मंत्री के रूप में शाह महमूद कसूरी को इमरान ने नियुक्त किया है। कसूरी पीपीपी सरकार में 2008 से 2011 तक विदेश मंत्री रह चुके हैं।

मुंबई हमले के दौरान वे भारत में ही थे और उन्हें जल्दी से देश छोड़ने को कहा गया था। तो भारत पाकिस्तान संबंधों की नाजुकता का उन्हें पूरा आभास है। इसलिए कुछ नया होने की उम्मीद नहीं है। इमरान ने कश्मीर में जिस तरह मानवाधिकार के उल्लंघन का आरोप लगाया था, उसे देखते हुए तत्काल कश्मीर में सीमा पार से आतंकवाद रोके जाने की संभावना भी नहीं दिख रही है।

उनके शपथ के दिन ही युद्ध विराम का उल्लंघन करते हुए गोलीबारी की गई। यह सब इस बात का प्रमाण है कि हमें तत्काल सेना के इस प्रिय प्रधानमंत्री से विशेष उम्मीद नहीं करनी चाहिए।