बरसा सोना

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राष्ट्रमंडल खेल में भारत का अब तक का यह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। जिस तरह की जीवटता, संघर्ष, खेल को लेकर पागलपन की हद तक जुनून भारतीय खिलाड़ियों ने दर्शाया है, वह काबिलेतारीफ है और लंबे वक्त तक लोगों के जेहन में याद रहेगा।

आस्ट्रेलिया का गोल्ड कोस्ट में आयोजित राष्ट्रमंडल खेल इस मामले में भी सालों तक खेल प्रेमियों का सीना गर्व से चौड़ा करता रहेगा, कि ज्यादातर सोना बेटियों पर बरसा है। अब तक झटके 7 पीले तमगे में से पांच लड़कियों ने हासिल किए हैं।

यह देश की आधी आबादी की मजबूती और विश्व को भारतीय लड़कियों की अदम्य क्षमता को परिलक्षित करता है। हालांकि लड़कियों की लंबी छलांग में उनके संघर्ष और परिवार का जज्बा ज्यादा मायने रखते हैं। जहां किसी खिलाड़ी को आधारभूत सुविधाओं के बगैर प्रैक्टिस करनी पड़ी तो कइयों के परिवार को आधे पेट या भूखे रहकर गुजारा करना पड़ा। यह जिजीविषा ही भारत को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

इन प्रतिकूल हालात के बावजूद अगर भारत की झोली में स्वर्ण पदक सहित कुल पदकों की संख्या विकसित देशों के बराबर हो तो हर किसी की खुशी दोगुनी-तिगुनी होना लाजिमी है। यह तथ्य हर किसी के संज्ञान में है कि भारत में खेल की सुविधाएं किस स्तर की है? न तो कायदे के प्रशिक्षक हैं, न स्पोर्ट स्टाफ और न आधारभूत ढांचा? फिर भी हाल के वर्षों में खेल को लेकर-सरकार और खेल प्रेमी-दोनों की सोच में सकारात्मक बदलाव आया है।

सरकार ने भी बजट में खेल पर रकम बढ़ाई है वहीं खिलाड़ियों में भी श्रेष्ठ प्रदर्शन करने का हौसला परवान चढ़ा है। हालांकि अब भी हम शैशव अवस्था में हैं मगर इतना तो साफ है कि अगर यथोचित साजो-सामान और सुविधाएं मुहैया कराई जाए तो हम खेल की दुनिया में एक बड़ी ताकत बन सकते हैं।

वैसे इस परिदृश्य को बदलने के लिए खेल में नेताओं की घुसपैठ, भ्रष्टाचार और नौकरशाही के दबाव खत्म करना होगा। खेल संस्थाओं में खिलाड़ियों को ही बिठाया जाना सुनिश्चित करना होगा। जब तक हम खिलाड़ियों को सम्मान और महत्त्व नहीं देंगे, तब तक बेहतरी की उम्मीद करना नासमझी के सिवा कुछ भी नहीं होगा।