बयान पर बवाल

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भारतीय जनता पार्टी के 38वें स्थापना दिवस समारोह में पार्टी के अध्यक्ष अमित भाई शाह के विपक्षी एकजुटता के बयान पर बवाल मचा हुआ है। पंचतंत्र की कहानी का उदाहरण देते हुए शाह का कहना था कि जब बाढ़ आती है और सारे पेड़-पौधे बह जाते हैं तो सिर्फ एक वटवृक्ष बच जाता है। ऐसे में सांप-नेवला, कुत्ता-बिल्ली, चीता सब एक हो जाते हैं और पेड़ पर चढ़कर अपनी जान बचाते हैं।

कट्टर दुश्मनी का उन जीवों का चरित्र विपत्ति के वक्त बदल जाता है। शाह के इसी उद्धहरण पर विपक्ष भाजपा पर हमलावर हो गया है। बसपा नेता मायावती ने इसे भाजपा की नैतिकता, शुचिता और ईमानदारी से जोड़ते हुए शाह और नरेन्द्र मोदी दोनों पर हमला बोल दिया है। राहुल गांधी भी शाह के बयान से बिफरे हुए हैं। स्वाभविक तौर पर विपक्ष शाह के जानवरों से पार्टियों की तुलना को लेकर बेहद आक्रामक तेवर में है।

वह इस बयान के बहाने भाजपा के डमगगाते आत्मविश्वास और जनता के बीच उसके गिरते भरोसे के तौर पर देख रही है। यही वजह है कि विपक्ष शाह के बयान को उसके डर के रूप में प्रचारित कर रही है। संविधान के तहत हर किसी को बोलने की आजादी का अधिकार है। लेकिन किसे कब, क्या और कैसे बोलना है, यह समझदारी आज तक ज्यादातर नेताओं में नहीं आई है।

राजनीति करना तो ठीक है, मगर बिगड़े बोल से न केवल आपसी संबंधों में खटास पैदा होती है वरन देश की छवि भी दागदार होती है। हर दल और हरेक नेता को इसकी महत्ता को जानना और समझना होगा। और इससे भी ज्यादा ऐसी बातों को अमल में लाना होगा। अमर्यादित बोल से भले नेताओं और राजनीतिक दलों को त्वरित फायदा होता हो, परंतु देश और समाज में व्याप्त सहिष्णुता इससे आहत होती है।

ऐसा नहीं है कि इससे पहले इस तरह की बयानबाजी नहीं हुई हो। यह तो अब एक चलन बन चुका है। पहले बयान दो; बात ज्यादा बिगड़े या माहौल पार्टी के खिलाफ जाता दिखे तो सफाई दे दो और अंत में ‘बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया’ जैसे चलताऊ बयान जारी कर पीछा छुड़ा लो।

लोकतंत्र को अगर जिंदा रखना है तो खद्दरधारियों को अपने व्यवहार में लचीलापन और चाल-चलन में खुद्दारी लानी होगी। विपक्ष की एकुजटता को दूसरे तरीके से भी समझाया जा सकता है। राजनीति में किसी की बात बुरी नहीं लगे, यह अहम है।