बच्चियों से बर्बरता

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आए दिन जिस तरह से लड़कियों के साथ बर्बर अपराध के मामले सामने आ रहे हैं वो दिल दहलाने वाले हैं1 अभी कठुआ में 8 वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म का मामला ठंडा भी नहीं पड़ा कि सूरत और कानपुर में दो लड़कियों के साथ हुई वारदात सुर्खियां बन गई हैं।

सूरत में खेल के मैदान से एक ऐसी लड़की का शव बरामद हुआ है, जिसकी उम्र 9 से 11 वर्ष के बीच है। उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कुल 86 जख्मों के निशान मिले हैं। इसका अर्थ यह निकाला गया है कि उसका अपहरण करके कहीं रखा गया, जहां उसे यातनाएं दी गई एवं बलात्कार किया गया।

लड़की की पहचान नहीं हो पा रही है। कौन हैं ऐसे मानिसक रोग वाले अपराधी जो इस तरह हमारी बच्चियों को अपना शिकार बना रहे हैं? उधर कानपुर में तो दिनदहाड़े एक 16 वर्षीया बालिका को हैंडपम्प से पानी भरने के विवाद में मिट्टी तेल डालकर आग लगा दिया गया। उसे 85 प्रतिशत जले हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

क्या कानून के राज में किसी लड़की के साथ ऐसा होने का विश्वास किया जा सकता है? उस लड़की का दोष क्या था?

वह पानी भर रही थी और दो लड़कों ने कहा कि हमें पहले भरने दो। विरोध करने पर उसे आग के हवाले कर दिया गया। ये ऐसी घटनाएं हैं, जो मीडिया की सुर्खियां बन गई। निश्चय ही ऐसी और घटनाएं हो रही होंगी जो इस तरह सुर्खियां नहीं बन पातीं। ऐसी घटनाएं हमें एक साथ कई बातें सोचने को मजबूर करती हैं। इसका एक राजनीतिक पहलू यह है कि ये सारी घटनाएं अभी भाजपा शासित राज्यों की हैं।

जम्मू-कश्मीर में भाजपा की पीडीपी के साथ सरकार है तो उत्तर प्रदेश में राजग की एवं गुजरात में उसकी अपनी। विरोधी स्वाभाविक ही भाजपा को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। हालांकि हमारा मानना है कि महिलाओं-लड़कियों के साथ होने वाले अपराध को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। यह हमारे समाज पर ऐसे बदनुमा दाग की तरह बार-बार उभर आता है, जिससे मुक्ति अपरिहार्य है।

आखिर हमने कैसा समाज बना दिया है, जहां हमारे ही परिवार की महिलाएं एवं लड़कियां ऐसे अपराधों का शिकार हो रही है? यह कानून और व्यवस्था का मामला तो है। प्रदेश की कानूनी एजेंसियों का भय ऐसे अपराधों की रोकथाम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस पहलू से राज्य सरकारों की कानूनी एजेंसियां कठघरे में खड़ा होती हैं।

किंतु इससे परे यह सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक प्रश्न भी है।