बकरीद में हिंसा

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कश्मीर घाटी में बकरीद के दिन जो कुछ हुआ, वह हर दृष्टि से चिंताजनक है। एक ओर आतंकवादियों ने तीन पुलिसकर्मिंयों और एक भाजपा कार्यकर्ता की हत्या कर दी तो दूसरी ओर उपद्रवियों ने नमाज अदा करने के बाद हिंसा की। श्रीनगर और अनंतनाग से जो दृश्य सामने आए, वे यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि मजहबी उन्मादी तत्वों के अंदर कानून का कोई भय है ही नहीं।

हालांकि यह निंदनीय इसलिए है क्योंकि सुरक्षा बल वहां उनकी ही सुरक्षा में लगे थे ताकि वे निर्भय होकर नमाज अदा कर सकें। ये नमाज खत्म होते ही पाकिस्तान और आईएस का झंडा लहराते भारत विरोधी नारे लगाते हुए पत्थरों की बारिश करने लगे। अनंतनाग में एक पुलिस वाहन इनकी चपेट में आ गया था। चालक उसे बचा रहा था, और ये लाठी-डंडों से हमला कर रहे थे।

किंतु इतना दुस्साहस वे कैसे कर रहे हैं? एक वाकया हजरतबल के प्रसिद्ध दरगाह में हुआ, जहां पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला को इसलिए विरोध झेलना पड़ा क्योंकि उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की श्रद्धांजलि सभा में ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए थे। उनके खिलाफ नारा लगाने वाले जाकिर मूसा के पक्ष में भी नारे लगा रहे थे। जूते तक फेंके गए।

फारूक को अंतत: बिना नमाज अदा किए लौटना पड़ा। बकरीद को कुरबानी का दिन माना जाता है यानी आप खुदा के लिए कुरबानी देकर समाज के लिए जीने की भावना पैदा करते हैं। उस दिन आतंकवादी अपने ही मजहब के निरपराध लोगों की हत्या करते हैं, तो उन्हें इस्लाम का दोस्त कहा जाए या दुश्मन? इसी तरह, सुरक्षा बलों पर हमला करने वालों को क्या कहा जाए?

फारूक के साथ जो हुआ तो वह तो सीधे-सीधे उन सभी लोगों को चुनौती है, जो भारत के पक्ष में खड़े होंगे। घटनाएं तीन हैं, लेकिन ये हैं एक ही विचारधारा की अंग। वह है कश्मीर को कट्टरपंथी इस्लामिक राज में परिणत करना और उसे पाकिस्तान का अंग बनाना। जाहिर है, इनका उपचार सख्त कार्रवाई के अलावा कुछ हो ही नहीं सकता।

प्रश्न है कि राज्यपाल शासन में भी अगर स्थिति सुधर नहीं रही तो कब सुधरेगी? फारूक के मामले में तो प्रशासन को इसका इल्म होना चाहिए था कि उनकी मुखालफत होगी। क्या उन्हें पहले से आगाह नहीं किया गया था? वीडियो में नारा लगाते लोग साफ दिख रहे हैं। पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर सकती है।

जाकिर मूसा जिन्दाबाद का मतलब आतंकवाद का समर्थन है। अगर सरकार इस मामले में चूकती है, तो फिर इसका संदेश यही जाएगा कि अगर फारूक अब्दुल्ला जैसे बड़े नेता के साथ ऐसा हो सकता है, तो जो भारत का पक्ष लेगा उसके साथ इससे भी बुरा किया जा सकता है।