बंद में हिंसा

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अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (एससी/एसटी एक्ट) के संबंध में बीते 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में दलित और आदिवासी संगठनों की तरफ से आयोजित भारत बंद का व्यापक असर तो हुआ लेकिन शांतिपूर्ण नहीं रहा।

राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, गुजरात और हरियाणा में बड़े पैमाने पर हिंसा और आगजनी की घटनाएं हुई। यह बंद का सबसे दुखद पहलू है। दलित हों या चाहे समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा अन्य तबका; उनके मसले पर भारत बंद का समर्थन किया जा सकता है, क्योंकि लोकतंत्र में सरकार या अदालत के किसी फैसले का विरोध करने का अधिकार सभी  नागरिकों को प्राप्त है।

लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने और कानून को अपने हाथ में लेने का अधिकार किसी को भी नहीं है। चाहे वह समाज का सबसे वंचित और कमजोर तबका ही क्यों हो। शीर्ष अदालत ने एससी/एसटी एक्ट, 1989 के तहत तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाने और अग्रिम जमानत को मंजूरी दिए जाने का फैसला सुनाया था।

अदालत ने कहा था कि मुकदमा दर्ज होने के पहले डीएसपी स्तर का अधिकारी पूरे मामले की प्रारंभिक जांच करेगा। दलित संगठनों का मानना है कि इस फैसले से एससी/एसटी एक्ट के प्रावधान शिथिल पड़ जाएंगे। इसलिए दलित संगठनों ने इसके विरोध में बीते सोमवार को भारत बंद का ऐलान किया था।

दलित संगठनों के इस तर्क में एक हद तक सचाई भी है कि शीर्ष अदालत के हालिया फैसले से लोगों में कानून का भय खत्म होगा और दलितों के खिलाफ अत्याचार में बढ़ोतरी हो सकती है। लेकिन यह भी सच है कि इस कानून का दुरुपयोग भी होता है। न्याय का तकाजा भी है कि किसी को सजा  देने के पहले उसके अपराध की जांच होनी चाहिए। शायद इसी पहलू पर विचार करते हुए शीर्ष अदालत ने एससी/एसटी एक्ट को लेकर अपना फैसला सुनाया था।

हालांकि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एससी/एसटी एक्ट पर पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी है। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने साफ तौर पर कहा है कि हमारी सरकार दलितों एवं आदिवासियों के अधिकारों के प्रति संकल्पबद्ध है। दरअसल, जैसा कि हर मामले में राजनीति होती रहती है, उसी तरह इस मामले का भी राजनीतिकरण कर दिया गया है। जिन राजनीतिक दलों ने भारत बंद का समर्थन किया है, उन्हें बंद के दौरान हुई व्यापक हिंसा की भी आलोचना करनी चाहिए।