फैसले का सम्मान हो

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सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति लोया की मृत्यु पर दायर जनिहत याचिकाओं को खारिज करते हुए जो टिप्पणियां की हैं वो काफी महत्वपूर्ण है। न्यायालय ने कहा कि राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति और चर्चा में आने के लिए जनिहत याचिकाओं का इस्तेमाल हो रहा है। ऐसे मामलों पर जिसको लेकर देश भर में तूफान खड़ा किया गया उसके संदर्भ में यदि न्यायालय ऐसी टिप्पणी कर रहा है तो इसका अर्थ यही है कि जो मुद्दा था ही नहीं, उसे जानबूझकर संदेहास्पद बनाया गया। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायमूर्ति लोया की मौत स्वाभाविक थी, इसलिए उसमें किसी तरह की जांच की आवश्यकता नहीं है।

न्यायालय के इस रु ख के बाद उम्मीद की जा सकती थी कि राजनीतिक दल और सक्रियतावादियों का समूह कम से कम फैसले का सम्मान करेंगे एवं अपना राजनीतिक हित साधने के लिए उसका इस्तेमाल नहीं करेंगे। किंतु जिस तरह की प्रतिक्रियाएं इस फैसले पर आ रहीं हैं वो चिंताजनक है। न केवल सक्रियतावादी अधिवक्ताओं का समूह फैसले को प्रश्नों के घेरे में ला रहा है, बल्कि राजनीतिक दल भी। जहां भाजपा ने इस फैसले पर कांग्रेस पर हमला किया वहीं कांग्रेस ने भाजपा पर जवाबी हमले के साथ फैसले पर भी सवाल उठा दिया।

राजनीतिक प्रतिष्ठान के साथ अन्य संस्थाओं की गिरती साख के बीच शीर्ष न्यायालय अभी तक आम लोगों की उम्मीद की किरण रहा है। लोग मानते हैं कि उन्हें और कहीं से न्याय मिले या नहीं उच्चतम न्यायालय से अवश्य मिलेगा। इस तरह यदि राजनीतिक दल एवं सक्रियतावादियों का समूह उसे भी निशाने पर लेगा, उसके फैसले को गलत साबित करेगा एवं प्रकारांतर से न्यायाधीशों के इरादों पर प्रश्न खड़ा करेगा तो फिर उम्मीद की अंतिम किरण भी खत्म हो जाएगी। इन्हें सोचना चाहिए कि अगर अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए उच्चतम न्यायालय तक की साख एवं विसनीयता खत्म कर देंगे तो देश में बचेगा क्या।

आप जैसा चाहते हैं और सोचते हैं वैसा ही न्यायालय भी करे यह आवश्यक नहीं। जब न्यायमूर्ति लोया का मामला न्यायालय के पास लाया गया तो उसने इसका त्वरित संज्ञान लिया। अब सभी पक्षों को सुनने के बाद उसे लगा कि न्यायमूर्ति लोया की मृत्यु हार्ट अटैक से हुई और उसमें कोई साजिश नहीं थी तो फिर आपको इसे स्वीकार करने में हर्ज नहीं होना चाहिए। किंतु जब इरादा सच तक पहुंचने की जगह राजनीति साधने की हो तो ऐसे फैसले को ये स्वीकार नहीं ही करेंगे।