फिर मारे गए जवान

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केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के छत्तीसगढ़ पहुंचने से महज कुछ घंटे पहले नक्सलियों ने दंतेवाड़ा के चोलनार में पुलिस के एसयूवी 500 वाहन को उड़ाकर राज्य-व्यवस्था को फिर चुनौती दी है। इस हमले में पुलिस के सात जवान मारे गए, जो सड़क निर्माण की सुरक्षा में तैनात थे। बड़े-बड़े समाजविज्ञानी, समाज सुधारक और राजनीतिक नेताओं का विश्वास है कि सामाजिक-आर्थिक विकास ही नक्सल समस्या का एकमात्र रास्ता है, क्योंकि गरीबी और पिछड़ापन नक्सलवाद या माओवाद को जन्म देता है। इस मत से असहमत होने का कोई कारण दिखाई नहीं देता।

लेकिन इस विश्वास को आगे बढ़ाते हुए कहा जा सकता है कि यह विचार नक्सलवाद जैसी सामाजिक-आर्थिक समस्या के वस्तुगत आधार के एक पहलू को ही रेखांकित करता है। अगर हम पिछले एक साल के दौरान छत्तीसगढ़ की बड़ी नक्सली घटनाओं की समीक्षा करें तो वास्तविकता कुछ और ही दिखाई देती है। 24 अप्रैल 2017 को सुकमा में सड़क बनाने के लिए सुरक्षा में तैनात सीआरपीएफ के जवानों पर हमला होता है, जिसमें 25 जवान मारे गए। इसी तरह, 11 मार्च 2017 को सुकमा के भेच्ची इलाके में सड़क निर्माण की सुरक्षा में तैनात सीआरपीएफ के जवानों पर नक्सली हमले में 11जवान मारे गए।

अगर इन नक्सली हमलों को ‘सीरिज ऑफ इवेन्ट्स’ में देखें तो साफ पता चलता है कि नक्सली विकास के विरोधी हैं और उन्हें स्थानीय नागरिकों का समर्थन भी हासिल नहीं है। दरअसल, कम्युनिस्ट आंदोलन की यह धारा पूरे विश्व में अप्रासंगिक हो गई है। नक्सल या माओवाद की आड़ में जो लोग सक्रिय हैं, वे पूरी तरह भटके हुए और आसामाजिक तत्व हैं।

उनका मकसद जबरिया उगाही करना है। अगर वे लोग हथियार नहीं डालते हैं तो देर-सबेर स्वत: मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ जाएंगे। छत्तीसगढ़ के नक्सल पीड़ित इलाकों में उनके खिलाफ सघन अभियान चलाने के लिए सरकार ने पहली बार बस्तरिया बटालियन का गठन किया है, जिसमें स्थानीय युवकों का प्रतिनिधित्व है।

खास बात यह है कि सरकार की नीतियों के मुताबिक इस बटालियन में 33 फीसद महिलाओं को शामिल किया गया है। इस बटालियन के गठन से नक्सलविरोधी अभियान में मारकता और तेजी आएगी। वैसे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने नक्सलियों से वार्ता का प्रस्ताव दिया है। अगर नक्सली नेता उनके इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं तो उम्मीद है कि नक्सली मसले के हल का कोई न कोई रास्ता निकल आएगा।