पोस्टर ब्वॉय की चिंता

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विवादास्पद शराब व्यवसायी विजय माल्या ने देश के सार्वजनिक बैंकों से  लिया गया नौ हजार करोड़ रुपये का कर्ज उतारने की पेशकश की है। इसके लिए अपनी शराब कंपनी युनाइटेड ब्रेवरीज समेत अन्य संपत्तियां बेचने को तैयार हो गए हैं। इस खबर से हर भारतीय नागरिक को प्रसन्नता हुई होगी क्योंकि बैंकों में जमा पूंजी आम जनता की होती है, और इस भारी भरकम कर्ज के डूबने से देश को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

लेकिन यह सवाल अहम है कि बैंकों की कानूनी कार्रवाइयों के दौरान चोरी छिपे ब्रिटेन भाग जाने वाले इस शराब व्यवसायी का अचानक हृदय-परिवर्तन कैसे हो गया? दरअसल, पिछले सप्ताह प्रवर्तन निदेशालय ने विशेष अदालत से ‘भगोड़ा आर्थिक अपराधी अध्यादेश-2018’ के तहत विजय माल्या को ‘भगोड़ा आर्थिक अपराधी’ घोषित करने की मांग की है।

इस नये कानून के तहत प्रवर्तन निदेशालय माल्या की करीब तेरह हजार पांच सौ करोड़ की संपत्ति जब्त करने की तैयारी में है। जाहिर है कि अपने खिलाफ कानून का शिंकजा कसता हुआ देखकर माल्या ने संपत्ति बेचकर बैंकों का कर्ज चुकाने का प्रस्ताव किया है। माल्या और नीरव मोदी की तरह अनेक ऐसे कारोबारी हैं, जिन्होंने बैंकों से लिया कर्ज लौटाया नहीं है।

विपक्षी पार्टियां माल्या और नीरव मोदी के सवाल पर जिस तरह से सरकार की घेराबंदी कर रही हैं, उससे जाहिर है कि आगामी दो हजार उन्नीस के लोक सभा चुनाव में एनपीए एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनेगा। इसीलिए केंद्र की भाजपा सरकार ने माल्या और नीरव मोदी जैसे मामलों में सख्त रुख अख्तियार किया है। माल्या के प्रत्यार्पण को लेकर भी सरकार सक्रिय है।

हालांकि माल्या ने इस पूरे मामले में अपने को निदरेष साबित करने की पूरी कोशिश की है। संभव है कि उन्होंने जो आरोप लगाए हैं, उनमें कुछ सचाई भी हो, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया का सामना करने के बजाय उन्होंने ब्रिटेन भाग जाने का फैसला किया। पर उनकी भगोड़े की छवि बनी तो इसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार हैं।

माल्या कर्ज वापस करने का कोई ठोस प्रस्ताव लेकर आते हैं, तो सरकार उनकी मदद कर सकती है। माल्या बैंकों का कर्ज लौटाने में सफल हो जाते हैं, तो यह एक मिसाल बन सकती है।