पूर्ण राज्य पर राजनीति

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने करीब साढ़े तीन साल तक सरकार चलाने के बाद दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए आंदोलन करने की घोषणा की है।

दिल्ली की सत्ता संभालने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ पहली मुलाकात में ही उन्होंने यह मुद्दा उठाया था। लेकिन सवाल उठता है कि अब अचानक ऐसा क्या हो गया है कि उन्हें इस मुद्दे को लेकर चरणबद्ध अभियान चलाने का ऐलान करना पड़ा है। पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की इस राय से असहमत होने का कोई कारण नजर नहीं आता कि नाकामियों से ध्यान हटाने के लिए पूर्ण राज्य का मुद्दा उठा रही है आम आदमी पार्टी।

हालांकि इस बात से कोई कैसे इनकार कर सकता है कि केंद्र सरकार और दिल्ली की सरकार के बीच वैचारिक मतभेद नहीं हैं। कुछ अन्य राज्यों में भी गैर-भाजपा दलों की सरकारें हैं, लेकिन वहां ऐसा कोई विवाद नहीं। दरअसल, मतभेदों के बीच से ही काम करने का रास्ता निकाला जाता है। सो राजनीति को संभाव्य की कला कहते हैं। लेकिन सत्ता में आने के साथ ही केजरीवाल और उनके सहयोगियों का केंद्र सरकार के साथ हर स्तर पर विवाद और टकराव जारी है।

इस विवाद को केजरीवाल की आधारहीन राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा का परिणाम कहा जा सकता है। इसका सबसे ज्यादा खमियाजा दिल्ली की जनता को उठाना पड़ रहा है। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने का मुद्दा राजनीति के लिहाज से बहुत अहम है क्योंकि राज्य की तीन प्रमुख शक्तियां-पुलिस, नौकरशाही और भूमि पर नियंत्रण केंद्र के पास हैं।

नगर निगम, शहरी निकाय और स्थानीय एजेंसियों के ऊपर दिल्ली सरकार के सीमित अधिकार हैं। पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है, और दिल्ली विकास प्राधिकरण की जवाबदेही केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के प्रति है। ऐसे में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा अवश्य मिलना चाहिए।

भाजपा और कांग्रेस, दोनों पार्टियां इस मुद्दे का समर्थन करती हैं, लेकिन आम आदमी पार्टी जिस गैर-जिम्मेदाराना ढंग से किसी भी मुद्दे को उठाती है, उसका कोई समर्थन नहीं कर सकता। बिजली और पानी सस्ता करके उसने कुछ गरीबों का दिल जरूर जीता है, लेकिन महज इनके भरोसे वह अगला चुनाव नहीं जीत सकती। इसीलिए वह आक्रामक ढंग से पुराने मुद्दे को उठा रही है। लेकिन पार्टी को याद रखना होगा कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती।