पुनर्याचिका प्रतिगामी

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सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश देने वाले सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के प्रति जिस तरह की जन प्रतिक्रियाएं अपेक्षित थीं, बिल्कुल वैसी ही हुई हैं। सर्वोच्च अदालत की पीठ ने मंदिर में प्रवेश पर लगे पुराने प्रतिबंध को लैंगिक भेदभाव और हिन्दू महिलाओं के धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन बताया था।

समाज के प्रगतिशील तबके ने प्रतिबंध को अनुचित ठहराते हुए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का समर्थन किया, लेकिन मंदिरवादी अैर रूढ़िवादी वर्ग अपने किसी भी धार्मिक और सांस्कृतिक परम्पराओं में बाह्य हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करता है। इस वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले राष्ट्रीय अय्यपा श्रद्धालु एसोसिएशन की अध्यक्ष शैलजा विजयन ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करके अनुरोध किया है कि वह अपने फैसले की समीक्षा करे। वास्तव में कोई भी ऐसी प्रवृत्ति या परम्परा जिसमें महिलाओं का बहिष्कार शामिल हो, उसका समर्थन संविधान नहीं करता है।

सर्वोच्च अदालत ने संविधान में प्रदत्त स्वतंत्रता और समानता के बृहत्तर मूल्य के अनुरूप ही फैसला दिया है। जहां कहीं भी संवैधानिक व्यवस्थाओं का हनन होता है, शीर्ष अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ता है। संविधान ने अदालत को यह अधिकार दिया है।सर्वोच्च अदालत के ही हस्तक्षेप के कारण समाज में सदियों से प्रचलित बहुत-सी धार्मिक-सामाजिक जड़ताएं समाप्त हो सकीं हैं।

सर्वोच्च अदालत के फैसले से देश का आम आदमी प्रसन्न है। विरोध करने वाले मुट्ठी भर लोग हैं, जिन्हें समझने की जरूरत है। केरल की माकपा नीत एलडीएफ सरकार ने न्यायालय के फैसले को लागू करने की अपनी वचनबद्धता दोहराकर प्रशंसनीय काम किया है। लेकिन राजनीतिक दल वोट बैंक के चलते जनभावनाओं में हस्तक्षेप नहीं करते हैं।

सही मायनों में राजनीतिक दलों की भूमिका यह होनी चाहिए कि वे रूढ़िवादी मानसिकता के विरुद्ध साहस दिखाएं। लेकिन भाजपा की प्रदेश इकाई आस्था और धार्मिक विश्वास के नाम पर सबरीमाला के मसले का राजनीतिककरण कर रही है। उसने पंडलम से तिरुवनंतपुर के बीच पांच दिवसीय ‘सबरीमाला बचाओ यात्रा’ आयोजित करने की घोषणा करके अनावश्यक ही इस मामले को तूल दे दिया है। भाजपा को रूढ़िवादियों-मंदिरवादियों का समर्थन करने के बजाय देश के कानून और संविधान के  प्रति अपनी आस्था प्रकट करनी चाहिए।