पीएम ने बचा लिया

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केन्द्र द्वारा फेक न्यूज यानी गलत समाचार के विरुद्ध जारी दिशानिर्देश एक व्यावहारिक कदम है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हस्तक्षेप कर सरकार के खिलाफ खड़े होने वाले एक बड़े बवण्डर से बचा लिया है।

वास्तव में समृति ईरानी के नेतृत्व में चलने वाले सूचना व प्रसारण मंत्रालय ने जो मार्गनिर्देश जारी किया था, उसमें हालांकि फेक न्यूज को जांचने का जिम्मा प्रेस परिषद एवं न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन को दिया गया था। लेकिन शिकायत करने का अधिकार तो सबको था।

दूसरे, शिकायत के साथ ही जांच होने तक उस पत्रकार की मान्यता निलंबित रहती। अगर शिकायत सही पाई गई तो उसकी मान्यता पहले कुछ समय के लिए और बाद में स्थायी रूप से रद्द हो जाती तथा किसी सरकारी कार्यालय में उसका प्रवेश प्रतिबंधित हो जाता।

फेक न्यूज के पक्ष में कोई नहीं है। पत्रकारिता तथ्यों पर आधारित हों यह सामान्य सिद्धांत है। हर सच्चा पत्रकार चाहता है कि वह जो कुछ भी लिखे या बोले उसका आधार तथ्य एवं सत्य ही हो। जो ऐसा नहीं कर रहा वह सच्चा पत्रकार नहीं है। लेकिन सरकार पत्रकारिता को नियंत्रित करे, यह सोच ही अलोकतांत्रिक है।

इस मार्गनिर्देश में पत्रकारिता को नियंत्रित और भयभीत करने का भाव था। कौन सा समाचार गलत है इसे तय करना अत्यंत कठिन है। सूचना एवं प्रसारण मंत्री को पता होना चाहिए कि जिन्हें मान्यता प्राप्त पत्रकार कहते हैं, उनकी संख्या कुल सक्रिय पत्रकारों का एक प्रतिशत भी नहीं है। इसलिए ऐेसे कदमों से ज्यादा फर्क भी नहीं पड़ता।

फिर देश भर के पत्रकारों का बड़ा वर्ग इसके विरोध में उतर जाता। विपक्षी पार्टयिां इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला साबित करने लगतीं। मोदी सरकार बनने के बाद यह उम्मीद थी कि या तो वह पत्रकारों को मान्यता देने की व्यवस्था के समाप्त कर देगी ताकि मान्यता प्राप्त एवं गैर मान्यताप्राप्त पत्रकारों का वर्गीकरण खत्म हो जाए या उसे जारी रखना था तो नौकरशाहों द्वारा तैयार पुराने नियमों में बदलाव लाती ताकि डेस्क पर काम करने वालों से लेकर स्वतंत्र पत्रकारिता करने वालों को भी आसानी से पीआईबी कार्ड मिल जाए।

सरकार पत्रकारों को मान्यता दे यह उचित भी नहीं। ऐसा करने की जगह वह पत्रकारिता को अपने इच्छानुसार चलाने की कल्पना करने लगी है। हमारा मानना है कि पत्रकारिता में स्वच्छता की आवश्यकता है लेकिन यह उसके अंदर से होने दिया जाए सरकारें इससे दूर रहें।