पाकिस्तान की गलतफहमी

,

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने कूटनीतिक दायित्व का निर्वहन करते हुए पाकिस्तान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री इमरान खान को सद्भावनापूर्ण पत्र क्या लिखा, दोनों देशों के राजनीतिक क्षेत्रों में तूफान मच गया। मोदी के पत्र का मजमून इतना भर था कि भारत पाकिस्तान के साथ रचनात्मक और सार्थक बातचीत के लिए प्रतिबद्ध है।

इसका आशय यह नहीं था कि दिसम्बर 2015 में दोनों देशों के बीच शुरू की गई समग्र वार्ता को फिर से बहाल की जाए, जो जनवरी 2016 में पठानकोट एअरबेस पर हुए आतंकी हमले के बाद से स्थगित है। लेकिन पाकिस्तान के नये विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने प्रधानमंत्री मोदी के इस पत्र की व्याख्या ऐसे की मानों उन्होंने इमरान खान को बातचीत करने का न्योता भेजा है।

यह कहना मुश्किल है कि उन्होंने जानबूझ कर ऐसा किया था या यह उनकी कूटनीतिक नासमझी थी। लेकिन इतना जरूर है कि उनके इस कूटनीतिक दांव से भारत के विपक्षी दल कांग्रेस को मोदी सरकार की पाकिस्तान संबंधी नीति को लेकर घेरने का मौका मिल गया। हालांकि भारतीय विदेश मंत्रालय ने कुरैशी के दावे का तुरंत खंडन कर दिया। जाहिर है कि कुरैशी के इस पैंतरे से पाकिस्तान को वैश्विक कूटनीतिक हलकों में शर्मिदगी उठानी पड़ी है।

दरअसल, भारत हमेशा से शांतिपूर्ण बातचीत का पक्षधर रहा है। लेकिन यह महज संयोग मात्र नहीं है कि हर बार सीमा पार से होने वाले आतंकवादी हमलों से बातचीत के दरवाजे बंद हो जाते हैं। पाकिस्तान का सैन्य प्रतिष्ठान जिसकी सत्ता पर वास्तविक कब्जा रहता है, वह साजिशन वार्ता की प्रक्रिया को बिगाड़ देता है। इसलिए भारत को मजबूर होकर कठोर लाइन अख्तियार करनी पड़ी है कि शांति के लिए बातचीत की प्रक्रिया और हिंसा साथ-साथ नहीं चल सकती।

भारत की स्पष्ट राय है कि पाकिस्तान को सीमा पार से होने वाले आतंकवादी हमलों पर पूरी तरह से लगाम लगाने के बाद ही बातचीत की प्रक्रिया बढ़ाई जा सकती है। यह मांग अव्यावहारिक भी नहीं है। किसी भी गुफ्तगू की कामयाबी में साफ ईमान एक अहम किरदार है और यही यहां गायब है।

ऐसे में, इमरान खान वास्तव में भारत-पाक संबंधों को पटरी पर लाना चाहते हैं, उन्हें सीमा पार से जारी आतंकवाद को नेस्तनाबूद करने पर गंभीरता से सोचना होगा। पाकिस्तान के आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए भी इस उपमहाद्वीप को आतंक-मुक्त करना आवश्यक है।