पराली को जलाएं नहीं, बनाएं कमाई का जरिया

आईएएनएस, नई दिल्ली

नासा की ताजा तस्वीरें भारतीयों को जरूर चौंका रही होंगी, लेकिन सरकारी तंत्र को नहीं। ये तस्वीरें जंगल में आग लगने की नहीं हैं, बल्कि कई राज्यों में धधकते खेतों की हकीकत है। गेहूं कटने के बाद बचे ठूठों और धान की बाली से दाना निकालने के बाद बचे पुआल जिसे पराली या कहीं पइरा भी कहते हैं, को जलाने का नया रिवाज शुरू हो गया है। इससे वायुमंडल में प्रदूषण के साथ ब्लैक कार्बन भी बढ़ता है जो ग्लोबल वार्मिग भी बढ़ाता है। नतीजा सामने है, गर्मी शुरू होते ही तपिश हमें झुलसाने लगती है।

पराली की आग उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ समेत दक्षिण के कई राज्यों में भी जगह-जगह दिख रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि कभी पंजाब और हरियाणा के खेतों तक सीमित यह चलन अब पूरे देश में है। यकीनन हालात चिंताजनक हैं और आलम बेफिक्री का। कहीं कोई पुख्ता रोक-टोक नहीं है। कई बार खेतों की आग सटे जंगल तक तबाह करती है तो करीबी शहरों की हवा बिगाड़ती है।

सालों से दिल्ली, पंजाब, एनसीआर और करीबी राज्यों की खरीफ और रवी की फसल कटने के बाद लगाई जाने वाली आग से वातावरण गैस चेम्बर में तब्दील हो जाता है। ऐसेहालात अब अमूमन पूरे देश में दिखने लगे हैं।

पुआल या पराली फायदेमंद

पुआल या पराली फायदेमंद भी है। एक टन में 5.50 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फॉस्फोरस, 1.30 किलो सल्फर और 25 किलो पोटेशियम होता है। इससे गैस संयत्र भी बन सकता है जिससे खाना बनाना और गाड़ी चलाना संभव है। गैस के अलावा खाद भी बन सकती है, जिसकी बाजार में कीमत 5,000 रुपये प्रति टन है और ऑथरेसिलिक एसिड भी तैयार होगा। इस तरह केवल जलाकर ही निपटान के प्रति जागरूकता की जरूरत है। इससे खासकर भारत में बढ़ते वायु प्रदूषण में कमी तो लाई जा सकेगी, साथ ही खाद व गैस का बेहतर विकल्प भी तैयार हो सकता है।

सभी राज्य सरकारों व केंद्र को इसके लिए व्यावहारिक और प्रभावी तौर पर जमीनी कार्य योजना तैयार करनी होगी, ताकि जहां पर्यावरण की रक्षा तो हो ही, साथ ही किसानों की मानसिकता भी बदले और आगे चलकर बेहतर नतीजे दिखें, जिससे हम अपनी प्यारी धरती

के साथ इंसाफ भी कर सकें।