पठानकोट में कठुआ

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कठुआ मामले को पठानकोट अतिरिक्त सत्र न्यायालय में स्थानांतरित करना एक बड़ा फैसला है। एक नाबालिग मासूम लड़की का शव मिलने के बाद इस मामले ने जिस तरह का स्वरूप ग्रहण किया है, उसमें सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप स्वाभाविक हो गया था। इस फैसले के बाद अब पठानकोट में बंद न्यायालय में प्रतिदिन सुनवाई करके जल्द फैसला हो सकेगा।

हालांकि यह मानना गलत है कि केवल पीड़ित परिवार और उनके वकील की सहमति से सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला किया है। न्यायालय ने साफ कहा कि उसने आरोपितों की भी सहमति ली। वास्तव में पीड़ित लड़की के पिता के नाम पर वकीलों ने मामले को चंडीगढ़ स्थानांतरित करने की अपील की थी। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की है कि निष्पक्ष सुनवाई और भय विरोधाभासी सिद्धांत है।

निष्पक्ष सुनवाई का मतलब है कि पीड़ित, आरोपित और गवाह भयमुक्त वातावरण महसूस कर सकें। इसलिए किसी तरह इसे एक पक्ष की विजय बताना मुनासिब नहीं है। हां, मामले की जांच सीबीआई से कराने की अपील नहीं मानी गई है। कोई कह सकता है कि ऐसा कर सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर पुलिस की अपराध शाखा द्वारा की गई जांच पर संतोष प्रकट कर दिया है।

किंतु यह व्याख्या गलत होगी। न्यायालय ने आरोपों एवं तथ्यों पर विचार किया ही नहीं है। उसने यह स्पष्ट किया है कि वह मामले की निगरानी करता रहेगा और अगली सुनवाई की तिथि नौ जुलाई निर्धारित भी कर दिया है। चूंकि अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में मामले की सुनवाई होगी, इसलिए यह उम्मीद करनी चाहिए कि न्यायिक प्रक्रिया सही दिशा में जाएगी।

न्यायालय ने कहा भी है कि जरूरत पड़ी तो पूरक आरोप पत्र दायर किया जा सकता है। वैसे भी हमारे देश में न्यायालयों पर अविास नहीं रहा है। किंतु न्यायालय के सामने पुलिस जो तथ्य एवं साक्ष्य पेश करते हैं, फैसला उन्हीं आधारों पर होता है। इस मामले में जांच एवं आरोप पत्र पर गंभीर प्रश्न उठ चुके हैं। कई गवाहों ने टीवी चैनलों पर साफ बयान दिया है कि अपराध शाखा ने उनसे मारपीट की और जबरन बयानों पर दस्तखत करवाए। पूरे जम्मू में मामले को लेकर उबाल है एवं लोग कह रहे हैं कि असली अपराधियों को पकड़ने की जगह पुलिस ने गलत लोगों को फंसाया है।

संभव है सर्वोच्च न्यायालय के सामने फिर सीबीआई से जांच कराने की याचिका आए।