न्याय का चेहरा

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अपने कई ऐतिहासिक फैसलों के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा का कार्यकाल हमेशा याद किया जाएगा। उनके फैसले आने वाले समय में भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन को गहराई से प्रभावित करेंगे।

चाहे वह समलैंगिक संबंधों का प्रश्न हो या व्यभिचार का, सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का सवाल हो या आधार का, उनके फैसले इसी श्रेणी में आते हैं। इससे एक बात स्पष्ट है कि समाज की नैतिकता पर संविधान की नैतिकता स्थापित करने में मदद मिलेगी। संविधान में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जो न्यायपालिका को उसके सामाजिक कर्त्तव्य के प्रति जागरूक करे।

इसलिए न्यायालय का यह दायित्व बन जाता है कि वह समाज हित में अपने विवेक से फैसला दे। न्यायालय का यह दायित्व उस अवस्था में और बढ़ जाता है, जब स्वतंत्र भारत में सामाजिक-आर्थिक न्याय की स्थापना के लिए यथास्थिति को तोड़ना अपरिहार्य था। भारतीय न्यायपालिका स्वतंत्र भारत में शुरू से ही इसके प्रति सचेत थी। वह संविधान की व्याख्या प्रबुद्ध उदारवादी दृष्टि से करने की अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन इस प्रकार करती आ रही है, जिससे व्यक्ति के अधिकारों और उसकी गरिमा की रक्षा हो सके। सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसलों में भी यह भाव प्रतिबिंबित होता है।

सेवानिवृत्ति के लिए आयोजित समारोह के दौरान भी न्यायमूर्ति मिश्रा एक बार इसी बात को पुन: रेखांकित कर गए। उनकी चिंता के केंद्र में यही था कि न्याय का चेहरा मानवीय हो। उनके लिए इस बात का कोई महत्त्व नहीं था कि वह अमीर है या गरीब। हालांकि देशकाल की परिस्थितियों के अनुसार न्याय की अवधारणा अलग-अलग होती है, लेकिन इस बात को कौन नकार सकता है कि समता के साथ न्याय भी मिले। न्याय एक गतिशील अवधारणा है, जिसे देशकाल की परिस्थितियों के अनुसार व्याख्यायित करने की आवश्यकता होती है।

न्याय की सार्थकता इसी में है कि वह सुदूर ग्रामीण अंचल में बैठे एक गरीब को आसानी से उपलब्ध हो। यह तभी संभव है, जब न्याय सस्ता और शीघ्र मिले। इसके अभाव में गरीबों की उम्मीद टूटने लगती है। न्यायालय में मुकदमों का अंबार चिंताजनक है। न्यायमूर्ति मिश्रा के संबोधन में इसकी चिंता दिखी, तो आशा भी। खास बात यह कि उनका स्थान लेने वाले न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की प्राथमिकता में यह पहलू शामिल है।