नेहरू का पंचशील और मोदी का स्ट्रेंथ

ओंकारेश्वर पांडेय , वरिष्ठ समूह संपादक (राष्ट्रीय सहारा)

अप्रैल 2018 का आखिरी हफ्ता दुनिया के इतिहास में दो अहम मुलाकातों के लिए याद किया जाएगा। एक तरफ दो कोरियाई देशों के नेताओं ने करीब छह दशक पुरानी दुश्मनी भुलाकर दोस्ती के लिए सीमाएं लांघ दीं। वहीं डोकलाम विवाद के बाद आये तनाव को भुलाते हुए दो बड़े एशियाई देश चीन और भारत के नेता आपसी रिश्तों का नया पंचशील रचते नज़र आये। पहले बात भारत और चीन की। नरेन्द्र मोदी और शी जिनपिंग की। करीब 64 साल पहले 29 अप्रैल 1954 को भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीन के पहले प्रीमियर (प्रधानमंत्री) चाऊ एन लाई के साथ पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किया था, जो महज आठ साल यानी सन 1962 तक ही भारत-चीन रिश्तों की ठोस बुनियाद रह पाया।

सन 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर पंचशील समझौते की धज्जियां उड़ा दी थीं। तब से दोनों देशों के बीच विश्वास में जो कमी आयी, उसकी भरपाई कोई समझौता आज तक नहीं कर पाया। उसके बाद दोनों देशों में कोई युद्ध तो नहीं हुआ। पर चीन की शत्रुतापूर्ण हरकतों ने भारत की निगाहों में उसे बकौल जॉर्ज फर्नाडीस दुश्मन नंबर-वन बनाये रखा। चीन के साथ रिश्तों में जमी बर्फ वर्ष 1988 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के चीन दौरे से पिघली। तब से भारत-चीन रिश्तों में अनेक उतार-चढ़ाव के बावजूद क्रमिक सुधार तो आया है, पर कभी भी ये रिश्ता पंचशील के दौर के भाईचारे को हासिल नहीं कर पाया क्योंकि बात तो तुम शांति और विकास की करते रहे चीन। पर आतंकवाद के पोषक पाकिस्तान को संरक्षण तो तुम ही दे रहे हो न चीन। जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध के खिलाफ वीटो तुम ही कर देते हो चीन। भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने से तुम ही रोक रहे हो चीन। एनएसजी में भी तुम ही रोक रहे हो चीन।

जम्मू-कश्मीर के एक हिस्से समेत भारत की हजारों वर्ग मील जमीन अवैध रूप से कब्जाये बैठा चीन अरुणाचल प्रदेश के तवांग और अक्साई-चिन क्षेत्र को अपना दक्षिण तिब्बत कहता है और इन इलाकों में अक्सर घुसपैठ व अतिक्रमण के अलावा सड़कें और स्थायी निर्माण भी करता रहता है। डोकलाम में भारत के साथ विवाद उसके सड़क बनाने के कारण ही पैदा हुआ था। पाक कब्जे वाले कश्मीर के रास्ते चीन-पाक आर्थिक गलियारा और ग्वादर बंदरगाह बनाकर उसने भारत की चिंताएं और बढ़ायी हैं। अप्रैल 2017 में दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा से बौखलाये चीन ने अरुणाचल प्रदेश के छह जगहों के नाम भी बदल डाले थे।

इस पृष्ठभूमि में पीएम मोदी की चीन यात्रा को देखें तो भले ही इस दो दिवसीय दौरे में उनकी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से छह बार मुलाकातें हुई हों, झील से लेकर नाव तक और म्यूजियम से लेकर टेबल तक पर। वुहान शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी ने चीन के परंपरागत वाद्य यंत्रों पर मिले सुर मेरा-तुम्हारा जैसी धुन निकालने की कोशिश की हो और नेहरू के पंचशील की तरह चीन के साथ मजबूत रिश्तों के लिए ‘स्ट्रेन्थ’ का नया सिद्धांत दिया हो, बावजूद इसके चीन के साथ रिश्तों में विश्वास की कमी अभी तो है और रहेगी भी।

हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा देते हुए नेहरू ने बीजिंग में जिस पंचशील समझौते पर चीन के साथ हस्ताक्षर किये थे, उसके पांच मुख्य बिंदु थे-1. एक दूसरे की अखंडता और संप्रभुता का सम्मान, 2. परस्पर अनाक्रमण, 3. एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना, 4. समान और परस्पर लाभकारी संबंध और 5. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व। इसी समझौते के तहत भारत ने तिब्बत को चीन का एक क्षेत्र स्वीकार किया था, जिससे भारत-चीन संबंध सामान्य हो गये थे। डोकलाम के दौरान चीन ने भारत को इसी पंचशील समझौते को तोड़ने का आरोप लगाया था।

अब वुहान शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी ने चीन पर अपना जो नया पांच सूत्री सिद्धांत पेश किया है, उसके पांच बिंदु हैं 1. समान दृष्टिकोण, 2. बेहतर संवाद, 3. मजबूत रिश्ता, 4. साझा विचार और 5. साझा समाधान। इसका पहला ही बिंदु अगर चीन मान ले तो भारत के साथ रिश्ता सुधर सकता है। पाकिस्तान और आतंकवाद के प्रति उसकी भूमिका, मसूद अजहर पर प्रतिबंध, सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता और एनएसजी में भारत के प्रवेश तथा चीन-पाक आर्थिक गलियारे पर भारत का दृष्टिकोण अगर चीन मान ले तो दोनों देशों में मित्रता संभव है। पर क्या यह सब मान लेगा चीन? शायद नहीं। क्योंकि बात चाहे सीमा विवाद की हो, या भारत की किसी अन्य चिंता की, चीन अपनी ओर से कोई रियायत नहीं देना चाहता और उम्मीद करता है कि भारत अपने सभी दावे छोड़ दे, जो भारत के लिए कतई संभव नहीं है। फिर भी नेहरू के पंचशील समझौते के छह दशक बाद मोदी ने अपने ‘स्ट्रेन्थ’ की पंचशील से भारत-चीन रिश्तों को एक नया नज़रिया तो दे ही दिया है। इस नाते अप्रैल अंत की इन नेताओं की मुलाकात की खास अहमियत रहेगी ही।

वैसे सन 1988 में राजीव गांधी ने अपने शासन के चौथे वर्ष में अचानक चीन की ऐतिहासिक यात्रा की थी, जो उनके लिए भाग्यशाली साबित नहीं हुई। 1989 में वह सत्ता से बाहर हो गए थे। इस बार मोदी ने भी अपने शासन के चौथे साल में चीन की यात्रा की है, देखना यह उनके लिए लकी साबित होता है, या नहीं।

कोरिया प्रसंग

बीते शुक्रवार को उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन ने दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन के साथ ऐतिहासिक मुलाकात कर दुनिया को चौंका दिया। 1953 के समझौते के बाद पहली बार उत्तर और दक्षिण कोरिया के नेताओं ने विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की और एक साझा घोषणा पत्र जारी कर कोरियाई प्रायदीप में स्थायी शांति बहाली के साथ निरस्त्रीकरण करने पर भी सहमति जताई। दोनों कोरियाई नेता एक-दूसरे के गले भी लगे। यह सब कैसे हुआ? उत्तर कोरिया की इस रणनीति के पीछे चीन का दिमाग है। इसी महीने ट्रेन से गुपचुप चीन पहुंचे किम को राष्ट्रपति शी जिनपिंग यह समझाने में कामयाब रहे कि प्रतिबंधों से जर्जर उसका देश अमेरिका के हमले को कतई नहीं झेल पाएगा और परमाणु मिसाइल दागने पर तो पूरी दुनिया मिलकर उसे बर्बाद कर देगी। बेहतर है कि वह इराक और सीरिया बनने की गलती न करे। चीन ने यह सलाह अमेरिका को कोरियाई प्रायद्वीप से दूर रखने के लिए भी दी क्योंकि युद्ध होने पर अमेरिका चीन की सीमा पर आ पहुंचता, जो चीन को बर्दाश्त नहीं होता।

इसके बाद हुई दोनों देशों के नेताओं की मुलाकात ने कोरियाई प्रायद्वीप में युद्ध और शत्रुता के माहौल का अंत करते हुए शांतिपूर्ण संबंधों के नये अध्याय की भूमिका लिख डाली। निकट भविष्य में मून जे-इन उत्तरी कोरिया का दौरा करेंगे। दोनों देशों के नेता टेलीफोन पर भी नियमित बात करते रहेंगे। कोरियाई शिखर वार्ता पर पूरी दुनिया की निगाहें थीं, क्योंकि बीते साल उत्तर कोरिया ने छठा परमाणु परीक्षण करने के साथ अमेरिका तक मार कर सकने वाली मिसाइल का भी परीक्षण किया था और अपना परमाणु कार्यक्रम तेजी से बढ़ा रहा था। कोरियाई शिखर वार्ता ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और किम जोंग-उन के बीच होने वाली मुलाक़ात का एजेंडा ही बदल दिया है। अब ट्रंप क्या कहेंगे किम से? क्योंकि परमाणु निरस्त्रीकरण की घोषणा तो किम ने पहले ही कर दी। अब तो अमेरिका को उत्तर कोरिया से प्रतिबंध हटाने की बात करनी होगी। बड़ी चालाकी से चीन ने उत्तर कोरिया की पीठ पर हाथ रखकर अमेरिका को जतला दिया कि दुनिया के दादा तुम अकेले नहीं हो। बात साफ है, बहुध्रुवीय दुनिया बनने का यह एक बड़ा संकेत है। कोरियाई प्रायद्वीप और भारत-चीन में दोस्ती का नया अध्याय शुरू हो गया है।