नेपाल से घनिष्ठता

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नेपाल के प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली की भारत यात्रा के दौरान हुए समझौते और बातचीत दोनों देशों के सदियों पुराने घनिष्ठ संबंधों को वाकई और सुदृढ़ करेंगे या नहीं इसका आकलन इस समय जरा कठिन है।

हालांकि भारत ने अपनी ओर से इसकी पूरी कोशिश की है कि विकास में सहयोग के साथ नेपाल को भरोसे में लिया जाए। बीरगंज में नये इंटिग्रेटेड चेकपोस्ट के उद्घाटन से लोगों एवं सामानों के आवागमन का रास्ता ज्यादा सुगम एवं तीव्र होगा।

यही नहीं दोनों प्रधानमंत्रियों ने मोतिहारी और अमलेखगंज के बीच तेल पाइपलाइन की जो आधारशिला रखी, वह एकपक्षीय रूप से नेपाल के हित में है। नेपाल को तेल भारत के सड़क मागरे से जाता है, जिसमें कई बार बाधा भी आ जाती है। पाइपलाइन से इसे बिना बाधा के नेपाल पहुंचाया जा सकता है। यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच रक्सौल से काठमांडू तक रेललाइन विस्तार समझौते को हर दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मानना होगा।

अगर ऐसा हो जाता है तो दिल्ली से काठमांडू तक रेलमार्ग खुल जाएगा। इसे कुछ लोग चीन द्वारा तिब्बत के रास्ते काठमांडू तक रेल मार्ग विकसित करने के जवाब के रूप में देख रहे हैं। बावजूद इसके रेल संपकरे का दोनों देशों के आम लोगों एवं कारोबारियों के बीच समागम बढ़ेगा इसमें दो राय नहीं। इसी तरह जल परिवहन पर जो सहमति बनी है, उसका प्रभाव दूरगामी होगा।

नेपाल की सीमा किसी समुद्र को नहीं छूती है। नदियों के अंदर परिवहन के कारण नेपाल को भारत होते हुए समुद्र तक प्रवेश मिल जाएगा। ऐसी और भी बातें हैं, जिनके आधार पर कहा जाता है कि भारत ने ओली के विचारों को जानते हुए भी बड़ा दिल दिखाया है। जब वे पिछली बार प्रधानमंत्री बने थे, उनका रु ख खुलेआम भारत विरोधी था।

चीन के प्रति अत्यधिक झुकाव भारत की प्रतिक्रिया में पैदा हुआ था। ओली उस नीति से अलग हटेंगे इसके कोई संकेत नहीं हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को नेपाल बुलाकर जिस तरह की आवभगत ओली ने की वह भी भारत के लिए एक संकेत था। लेकिन समय की नजाकत को देखते हुए भारत प्रतिक्रियात्मक होने की जगह शांतिपूर्ण विकास के लिए सहयोग की रणनीति पर काम कर रहा है।

हम तो यही उम्मीद ही कर सकते हैं कि भारी बहुमत से सत्ता में आए ओली भारत-नेपाल के ऐतिहासिक संबंधों के साथ नेपाल के प्रति आम भारतीयों की संवेदनशीलता को समझेंगे एवं कोई ऐसा कदम नहीं उठाएंगे, जो आपसी हितों को चोट पहुंचाने वाली हो।