नेपाल की अपरिपक्वता

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नेपाल ने पुणे में चल रहे ‘बिम्सटेक’ देशों के पहले संयुक्त सैनिक युद्धाभ्यास के लिए अपनी फौज भेजने से इनकार करके कूटनीतिक अपरिपक्वता का परिचय दिया है। पिछले महीने ही नेपाल की राजधानी काठमांडू में इस क्षेत्रीय समूह का शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसमें भाग लेते हुए संयुक्त सैनिक युद्धाभ्यास की घोषणा की थी।

इसका उद्देश्य क्षेत्र में आतंकवाद की चुनौती से निपटने में आपसी सहयोग बढ़ाना है। समूह के सभी सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से इस प्रस्ताव का समर्थन किया था, लेकिन इस बीच ऐसा क्या हो गया है कि नेपाल को इसका बहिष्कार करना पड़ा। जाहिर है, नेपाल के इस कदम ने भारत समेत इस क्षेत्रीय समूह को दुविधाजनक स्थिति में डाल दिया है। हालांकि भारत ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताते हुए कहा है कि नेपाल ने बिम्सटेक के सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव का उल्लंघन किया है। नेपाल की ओर से दी गई सफाई भी कम हास्यास्पद नहीं है। कहा गया है कि विरोधी दलों और मीडिया के विरोधी रुख के कारण यह फैसला लेना पड़ा।

दरअसल, सचाई  यह है कि इस क्षेत्रीय समूह के बीच सुरक्षा और प्रतिरक्षा सहयोग बढ़ाने के भारतीय प्रस्ताव से नेपाल का वर्तमान नेतृत्व सहमत नहीं है। सच यह भी है कि नेपाली प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली दो हजार पंद्रह की आर्थिक नाकेबंदी की घटना से अब तक उबर नहीं पाए हैं। ओली इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी की सरकार को जिम्मेदार मानते रहे हैं।

नेपाल का चीन के करीब जाने के पीछे आर्थिक नाकेबंदी की निर्णायक भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। ध्यान रखने वाली बात है कि नेपाल की आर्थिक नाकेबंदी के समय ओली वहां के प्रधानमंत्री थे। अभी पिछले दिनों ही चीन ने नेपाल की वस्तुओं की आवाजाही के लिए अपने चार बंदरगाह खोल दिए हैं।

जाहिर है कि चीनी बंदरगाहों की सुविधा मिलने के बाद नेपाल की भारत पर निर्भरता कम हो जाएगी। लेकिन नेपाली नेतृत्व को ध्यान रखना चाहिए कि चीन और नेपाल की भौगोलिक दूरी एक बड़ा मुद्दा है। बिम्सटेक के फौजी युद्धाभ्यास का बहिष्कार और चीन के साथ इसी महीने युद्धाभ्यास की अनुमति देकर नेपाल के नेतृत्व ने अपने को अविसनीय बना दिया है। अब नेपाल के प्रति भारत का रुख भी वैसा ही रहेगा।