नेता राज्यपाल

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जम्मू-कश्मीर में सत्यपाल मलिक के रूप में एक राजनीतिक व्यक्ति को राज्यपाल नियुक्त करना निश्चय ही महत्त्वपूर्ण घटना है। 1965 से 1967 तक कर्ण सिंह को छोड़ दें तो वहां उसके बाद से किसी राजनीतिक व्यक्ति को राज्यपाल नहीं बनाया गया। एक नौकरशाह पूरी स्थिति को कानून और व्यवस्था के आईने में ज्यादा देखता है। जम्मू-कश्मीर में कानून-व्यवस्था महत्त्वपूर्ण पहलू है, पर उसके साथ राजनीतिक दृष्टिकोण से कदम उठाया जाना भी जरूरी है। यह भूमिका एक अनुभवी नेता ज्यादा बेहतर तरीके से निभा सकता है। इस समय जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन है। इस मायने में जम्मू-कश्मीर की पूरी स्थिति का दारोमदार केंद्र सरकार पर आ जाता है और मलिक उसके प्रतिनिधि के तौर पर उसकी नीतियों को क्रियान्वित करेंगे। मलिक विधायक, सांसद, मंत्री के साथ पार्टियों के अधिकारी भी रहे हैं। हालांकि वे खांटी भाजपाई नहीं हैं, जिनकी जम्मू-कश्मीर के बारे में अन्य पार्टियों से अलग विचारधारा है। वास्तव में भारतीय जनसंघ एवं भाजपा की अन्य पार्टियों से अलग पहचान जम्मू-कश्मीर के संबंध में उसका विशेष दृष्टिकोण के कारण ही है। मलिक की नियुक्ति से इतना तो साफ हो गया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विशुद्ध भाजपाई दृष्टिकोण से जम्मू-कश्मीर में अभी बड़ी पहल नहीं करने जा रहे हैं। जो कुछ है, उसी में अभी प्रदेश को संभालने और वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया आरंभ करने का कदम उठाया जाएगा। लाल किले से प्रधानमंत्री ने स्थानीय निकाय का चुनाव कराने का एलान किया था। तो मलिक उस दिशा में काम करेंगे और वे एक नेता हैं, इसलिए सारी पार्टियों से राय कर केंद्र को व्यावहारिक रिपोर्ट देंगे। मलिक के जाने के बाद यह भी संभव है कि जम्मू-कश्मीर में फिर से सरकार बनाने की कोशिश हो। राज्य से आ रहीं खबरों से पता चलता है कि अभी वहां ज्यादातर विधायक चुनाव नहीं चाहते। महबूबा मुफ्ती की पीडीपी में भी असंतोष है। यदि सरकार बनाने की पहल हुई तो उनकी पार्टी आराम से बिखर जाएगी। इस तरह देखें तो मलिक के सामने एक साथ वहां हिंसा पर काबू पाने, स्थानीय निकाय का सफलतापूर्वक और निष्पक्ष चुनाव कराने और फिर से सरकार गठित कराने जैसे कठिन कार्यों की चुनौती है। इसमें वे कितना सफल होते हैं, कहना कठिन है।